Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi ( Top 250+ )

आज हम बात करेंगे kabir ke dohe के बारे में, जैसे की आप जानते ही होगे की संत कबीर दस के दोहे बहुत ही उम्दा अनमोल वचन में से एक है जो हमें जीवन में  सुख और शांति लाने  में सहयोग करते है. kabir जी ने अपने dohe के जरिये लोगो को सफलता और शांति पाने के कई सारे सूत्र बताये है. आजके समय में kabir ke dohe प्रसिध्द है क्यूँ की लोग अपने जीवन को kabir ke dohe के सूत्र को अपने जीवन में अनुसरण करना चाहते है. और यही वो कारन है की आज हम आपसे 250+ Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] अर्थ सहित शेयर कर रहे है.

मुझे यकीं है की आप kabir ke dohe का अनुसरण अपने जीवन में करके अपने जीवन को बहुत ही सफलता प्राप्त करेंगे और जीवन जीने का तरीका सीखेगे. तो चलिए शुरू करते है. लेकिन इससे पहेले मई आपको एक बात बताना चाहूँगा. निचे आपको 15 kabir ke dohe हिंदी अर्थ सहित पढने मिलेंगे और उसके आगे-पीछे के kabir ke dohe पढने के लिए आपको < Prev और Next > बटन पर क्लिक करके kabir ke dohe slide करके पढने होगे. हर slide m आपको 15 kabir ke dohe अर्थ सहित पढने मिलेंगे.

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

250+ Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] aur Meaning in Hindi.

भक्ति बिगाडी कामिया, इन्द्रीन केरे स्वाद।
हीरा खोया हाथ सों, जन्म गंवाया बाद।।

अर्थ :- विषय भोगों के चक्कर में पडकर कामी मूर्ख मनुष्यों ने इन्द्रीयों को अपने वश में नहीं किया और सर्वहित साधन रूपी भक्ति को बिगाड दिया अर्थात् अनमोल हीरे को गंवाकर सारा जीवन व्यर्थ में गुजार दिया.

Kabir ke Dohe with Meaning in Hindi Language

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।

अर्थ :- जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.

2 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

ऊजल पाहिनै कपडा, पान सुपारी खाय।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपूर जाय।।

अर्थ :- सफेद रंग के सुन्दर कपडे पहनना और पान सुपारी खाना, यह पहनावा और दर्शन व्यर्थ है संत कबीर दास जी कहते हैं कि जो प्राणी सद्गुरू की भक्ति नहीं करता और विषय वासनाओं में लिप्त रहता है उसे यमदूत अपने पाशों नरक रुपी यातनाएँ सहना होता है.

3 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

जब मै था तब गुरु नहीं, अब गुरु है मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समांही।।

अर्थ :- जब अहंकार रूपी मैं मेरे अन्दर समाया हुआ था तब मुझे गुरु नहीं मिले थे, अब गुरु मिल गये और उनका प्रेम रस प्राप्त होते ही मेरा अहंकार नष्ट हो गया। प्रेम की गली इतनी संकरी है कि इसमें एक साथ दो नहीं समा सकते अर्थात गुरु के रहते हुए अहंकार नहीं उत्पन्न हो सकता.

4 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

क्यों नृपनारी निन्दिये, पनिहारी को मान।
वह मांग संवारे पीवहित, नित वह सुमिरे राम।।

अर्थ :- राजाओं महाराजाओं की रानी की क्यों निन्दा होती है और हरि का भजन करने वाली की प्रशंसा क्यों होती है? जरा इस पर विचार कीजिए। रानी तो अपने पति राजा को प्रसन्न करने के लिए नित्य श्रुंगार करके अपनी मांग सजाती है जबकि हरि भक्तिन घट घट व्यापी प्रभु राम नाम की सुमिरण करती है.

5 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

संगत कीजै साधु की, कभी न निष्फल होय।
लोहा पारस परसते, सो भी कंचन होय।।

अर्थ :- सन्तो के साथ रहना, उनके वचनों को ध्यानपूर्वक सुनना तथा उस पर अमल करना हितकारी होता है। सन्तों की संगति करने से फल अवश्य प्राप्त होता है जिस प्रकार पारसमणि के स्पर्श से लोहा भी सोना हो जाता है उसी प्रकार साधुओं के दिव्य प्रभाव से साधारण मनुष्य पूज्यनीय हो जाता है.

6 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

कहै हिन्दु मोहि राम पिआरा, तुरक कहे रहिमाना।
आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।।

अर्थ :- एक तरफ भारतीय हैं जो कहते हैं कि हमें राम प्यारा है दूसरी तरफ तुर्क हैं जो कहते हैं कि हम तो रहीम के बंदे हैं। दोनों आपस में लड़कर एक दूसरे को तबाह कर देते हैं पर धर्म का मर्म नहीं जानते.

7 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।।

अर्थ :- शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं.

8 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

पाँच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय।।

अर्थ :- पांच पहर काम पर गए, तीन पहर नींद में बिताए, आखिरी एक पहर में भी भगवान् को याद नहीं किया, अब आप ही बताईये कि मुक्ति कैसे मिलेगी.

9 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

गुरु गोविन्द दोऊ एक हैं, दुजा सब आकार।
आपा मैटैं हरि भजैं, तब पावैं दीदार।।

अर्थ :- गुरु और गोविंद दोनो एक ही हैं केवळ नाम का अंतर है. गुरु का बाह्य(शारीरिक) रूप चाहे जैसा हो किन्तु अंदर से गुरु और गोविंद मे कोई अंतर नही है. मन से अहंकार कि भावना का त्याग करके सरल और सहज होकर आत्म ध्यान करने से सद्गुरू का दर्शन प्राप्त होगा. जिससे प्राणी का कल्याण होगा. जब तक मन मे मैलरूपी “मैं और तू” की भावना रहेगी तब तक दर्शन नहीं प्राप्त हो सकता.

10 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं कि रात सो कर गवां दी, और दिन खाने-पीने में गुजार दिया। हीरे जैसा अनमोल जीवन, बस यूं ही व्यर्थ गवां दिया.

11 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाए।
वैद्य बिचारा क्या करे, कहां तक दवा खवाय॥

अर्थ :- चिंता ऐसी डाकिनी है, जो कलेजे को भी काट कर खा जाती है. इसका इलाज वैद्य नहीं कर सकता। वह कितनी दवा लगाएगा. वे कहते हैं कि मन के चिंताग्रस्त होने की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है, जैसे समुद्र के भीतर आग लगी हो. इसमें से न धुआं निकलती है और न वह किसी को दिखाई देती है. इस आग को वही पहचान सकता है, जो खुद इस से हो कर गुजरा हो.

12 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान।
तीन लोक की संपदा, रही शील में आन।।

अर्थ :- जीवन में विनम्रता सबसे बड़ा गुण होता है, यह सब गुणों की खान है. सारे जहां की दौलत होने के बाद भी सम्मान, विनम्रता से ही मिलता है.

13 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।।
एक सिंहासन चढ़ी चले, एक बँधे जात जंजीर ।

अर्थ :- जो भी व्यक्ति इस संसार में आता है चाहे वह अमीर हो या फिर गरीब हो वह आखिरकार, इस दुनिया से चला जाता है. एक व्यक्ति को धन-दौलत मिलती है जबकि दूसरा जात-पात की जंजीरों में जकड़ा रहता है.

14 ] Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष।।

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है – हे सांसारिक प्राणीयों. बिना गुरु के ज्ञान का मिलना असंभव है. तब टतक मनुष्य अज्ञान रुपी अंधकार मे भटकता हुआ मायारूपी सांसारिक बन्धनो मे जकडा राहता है जब तक कि गुरु की कृपा नहीं प्राप्त होती. मोक्ष रुपी मार्ग दिखलाने वाले गुरु हैं. बिना गुरु के सत्य एवम् असत्य का ज्ञान नही होता. उचित और अनुचित के भेद का ज्ञान नहीं होता फिर मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? अतः गुरु कि शरण मे जाओ. गुरु ही सच्ची रह दिखाएंगे.

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

250+ Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] aur Meaning in Hindi.

कामी क्रोधी लालची, इनते भक्ति ना होय।
भक्ति करै कोई सूरमा, जादि बरन कुल खोय।।

अर्थ :- विषय वासना में लिप्त रहने वाले, क्रोधी स्वभाव वाले तथा लालची प्रवृति के प्राणियों से भक्ति नहीं होती. धन संग्रह करना, दान पूण्य न करना ये तत्व भक्ति से दूर ले जाते है. भक्ति वही कर सकता है जो अपने कुल, परिवार जाति तथा अहंकार का त्याग करके पूर्ण श्रद्धा एवम् विश्वास से कोई पुरुषार्थी ही कर सकता है. हर किसी के लिए संभव नहीं है.

भक्ति बीज पलटे नहीं, जो जुग जाय अनन्त।
ऊँच नीच बर अवतरै, होय सन्त का सन्त।।

अर्थ :- भक्ति का बोया बीज कभी व्यर्थ नहीं जाता चाहे अनन्त युग व्यतीत हो जाये. यह किसी भी कुल अथवा जाति में ही, परन्तु इसमें होने वाला भक्त सन्त ही रहता है. वह छोटा बड़ा या ऊँचा नीचा नहीं होता अर्थात भक्त की कोई जात नहीं होती.

प्रीती बहुत संसार में, नाना विधि की सोय।
उत्तम प्रीती सो जानियो, सतगुरु से जो होय।।

अर्थ :- इस जगत में अनेक प्रकार की प्रीती है किन्तु ऐसी प्रीती जो स्वार्थ युक्त हो उसमें स्थायीपन नहीं होता अर्थात आज प्रीती हुई कल किसी बात पर तू-तू, मै-मै होकर विखंडित हो गयी. प्रीती सद्गुरु स्वामी से हो तो यही सर्वश्रेष्ठ प्रीती है. सद्गुरु की कृपा से, सद्गुरु से प्रीती करने पर सदा अच्छे गुणों का आगमन होता है.

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

अर्थ :- न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है. जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है.

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय।
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय॥

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता. प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके.

माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।
माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख॥

अर्थ :- माँगना मरने के बराबर है, इसलिए किसी से भीख मत मांगो. सतगुरु कहते हैं कि मांगने से मर जाना बेहतर है, अर्थात पुरुषार्थ से स्वयं चीजों को प्राप्त करो, उसे किसी से मांगो मत.

करु बहियां बल आपनी, छोड़ बिरानी आस।
जाके आंगन नदिया बहै, सो कस मरै पियास।।

अर्थ :- मनुष्य को अपने आप ही मुक्ति के रास्ते पर चलना चाहिए। कर्म कांड और पुरोहितों के चक्कर में न पड़ो. तुम्हारे मन के आंगन में ही आनंद की नदी बह रही है, तुम प्यास से क्यों मर रहे हो? इसलिए कि कोई पंडित आ कर बताए कि यहां से जल पी कर प्यास बुझा लो. इसकी जरूरत नहीं है. तुम कोशिश करो तो खुद ही इस नदी को पहचान लोगे.

दुख लेने जावै नहीं, आवै आचा बूच।
सुख का पहरा होयगा, दुख करेगा कूच।।

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुःख लेने कोई नहीं जाता. आदमी को दुखी देखकर लोग भाग जाते हैं. किन्तु जब सुख का पहरा होता होता है तो सभी पास आ जाते हैं.

गुरु शरणगति छाडि के, करै भरोसा और।
सुख संपती को कह चली, नहीं नरक में ठौर।।

अर्थ :- संत जी कहते हैं कि जो मनुष्य गुरु के पावन पवित्र चरणों को त्यागकर अन्य पर भरोसा करता है उसके सुख संपती की बात ही क्या, उसे नरक में भी स्थान नहीं मिलता.

पढ़ि पढ़ि के पत्थर भये, लिखि भये जुईंट।
कबीर अन्तर प्रेम का लागी नेक न छींट।।

अर्थ :- कबीर जी ज्ञान का सन्देश देते हुए कहते हैं कि बहुत अधिक पढकर लोक पत्थर के समान और लिख लिखकर ईंट के समान अति कठोर हो जाते हैं. उनके हृदय में प्रेम की छींट भी नहीं लगी अर्थात् ‘प्रेम’ शब्द का अभिप्राय ही न जान सके जिस कारण वे सच्चे मनुष्य न बन सके.

मन मोटा मन पातरा, मन पानी मन लाय।
मन के जैसी ऊपजै, तैसे ही हवै जाय।।

अर्थ :- यह मन रुपी भौरा कहीं बहुत अधिक बलवान बन जाता है तो कहीं अत्यन्त सरल बन जाता है. कहीं पानी के समान शीतल तो कहीं अग्नि के समान क्रोधी बन जाता है अर्थात जैसी इच्छा मन में उपजत हैं, यह वैसी ही रूप में परिवर्तित हो जाता हैं.

सांचे को सांचा मिलै, अधिका बढै सनेह।
झूठे को सांचा मिलै, तड़ दे टूटे नेह।।

अर्थ :- सत्य बोलने वाले को सत्य बोलने वाला मनुष्य मिलता है तो उन दोनों के मध्य अधिक प्रेम बढता है किन्तु झूठ बोलने वाले को जब सच्चा मनुष्य मिलता है तो प्रेम अतिशीघ्र टूट जाता है क्योंकि उनकी विचार धारायें विपरीत होती है.

जिनके नाम निशान है, तिन अटकावै कौन।
पुरुष खजाना पाइया, मिटि गया आवा गौन।।

अर्थ :- जिस मनुष्य के जीवन मी सतगुरु के नाम का निशान है उन्हें रोक सकाने की भला किसमें सामर्थ्य है, वे परम पुरुष परमात्मा के ज्ञान रुपी भंडार को पाकर जन्म मरण के भवरूपी सागर से पार उतरकर परमपद को पाते है.

राजपाट धन पायके, क्यों करता अभिमान।
पडोसी की जो दशा, सो अपनी जान ।।

अर्थ :- राज पाट सुख सम्पत्ती पाकर तू क्यों अभिमान करता है. मोहरूपी यह अभिमान झूठा और दारूण दुःख देणे वाला है. तेरे पडोसी जो दशा हुई वही तेरी भी दशा होगी अर्थात् मृत्यु अटल सत्य है. एक दिन तुम्हें भी मरना है फिर अभिमान कैसा?

हरिजन तो हारा भला , जीतन दे संसार।
हारा तो हरिं सों मिले, जीता जम के द्वार।।

अर्थ :- संसारी लोग जिस जीत को जीत और जिस हार को हार समझते हैं हरि भक्त उनसे भिन्न हैं. सुमार्ग पर चलने वाले उस हार को उस जीत से अच्छा समझते हैं जो बुराई की ओर ले जाते हैं. संतों की विनम्र साधना रूपी हार संसार में सर्वोत्तम हैं.

कबीर क्षुधा है कुकरी, करत भजन में भंग।
वांकू टुकडा डारि के, सुमिरन करूं सुरंग।।

अर्थ :- संत स्वामी कबीर जो कहते हैं कि भूख उस कुतिया के समान है जो मनुष्य को स्थिर नहीं रहने देती। अतः भूख रुपी कुतिया के सामने रोटी का टुकडा डालकर शान्त कर दो तब स्थिर मन से सुमिरन करो.

ज्ञानी अभिमानी नहीं, सब काहू सो हेत।
सत्यवान परमार थी, आदर भाव सहेत।।

अर्थ :- ज्ञानी व्यक्ति कभी अभिमानी नहीं होते. उनके हृद्य में सबके हित की भावना बसी रहती है और वे हर प्राणी से प्रेम का व्यवहार करते है. सदा सत्य का पालन करने वाले तथा परमार्थ होते हैं.

शब्द सहारे बोलिय, शब्द के हाथ न पाव।
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव।।

अर्थ :- मुख से जो भी बोलो, सम्भाल कर बोलो कहने का तात्पर्य यह कि जब भी बोलो सोच समझकर बोलो क्योंकि शब्द के हाथ पैर नहीं होते किन्तु इस शब्द के अनेकों रूप है. यही शब्द कहीं औषधि का कार्य करता है तो कहीं घाव पहूँचाता है अर्थात कटु शब्द दुःख देता है.

नाम रसायन प्रेम रस, पीवन अधिक रसाल।
कबीर पीवन दुर्लभ है, मांगै शीश कलाल।।

अर्थ :- संत कबीर जी कहते है कि सद्गुरू के ज्ञान का प्रेम रस पीनें में बहुत ही मधुर और स्वादिष्ट होता है किन्तु वह रस सभी को प्राप्त नहीं होता. जो इस प्राप्त करने के लिए अनेकों काठीनाइयो को सहन करते हुए आगे बढता है उसे ही प्राप्त होता है क्योंकि उसके बदले में सद्गुरू तुम्हारा शीश मांगते हैं अर्थात् अहंकार का पूर्ण रूप से त्याग करके सद्गुरू को अपना तन मन अर्पित कर दो.

सतगुरु हमसों रीझि कै, कह्य एक परसंग।
बरषै बादल प्रेम को, भिंजी गया सब अंग।।

अर्थ :- सद्गुरू ने मुझसे प्रसन्न होकर एक प्रसंग कहा जिसका वर्णन शब्दों में कर पाना अत्यन्त कठिन है. उनके हृदय से प्रेम रुपी बादल उमड कर बरसने लगा और मेरा मनरूपी शरीर उस प्रेम वर्षा से भीगकर सराबोर हो गया.

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

सहज मिलै सो दूध है, मांगि मिलै सो पानि।
कहैं कबीर वह रक्त है, जामें ऐंचातानि।।

अर्थ :- उपरोक्त का निरूपण करते हुए कबीरदास जी कहते है. जो बिना मांगे सहज रूप से प्राप्त हो जाये वह दूध के समान है और जो मांगने पर प्राप्त हो वह पानी के समान है और किसी को कष्ट पहुंचाकर या दु:खी करके जो प्राप्त हो वह रक्त के समान है.

मोह सलिल की धार में, बहि गये गहिर गंभीर।
सूक्ष्म मछली सुरति है, चढ़ती उल्टी नीर।।

अर्थ :- मोहरूपी जल की तीव्र धारा में बड़े बड़े समझदार और वीर बह गये, इससे पार न पा सके. सूक्ष्म रूप से शरीर के अन्दर विद्यमान सुरति एक मछली की तरह है जो विपरीत दिशा ऊपर की ओर चढ़ती जाती है. इसकी साधना से सार तत्व रूपी ज्ञान की प्राप्ती होती है.

जो जल बाढे नाव में, घर में बाढै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम।।

अर्थ :- यदि नव में जल भरने लगे और घर में धन संपत्ति बढ़ने लगे तो दोनों हाथ से उलीचना आरम्भ कर दो. दोनों हाथो से बाहर निकालों यही बुद्धिमानी का काम है अन्यथा डूब मरोगे। धन अधिक संग्रह करने से अहंकार उत्पन्न होता है जो पाप को जन्म देता है.

बहुता पानी निरमला, जो टुक गहिरा होय।
साधु जन बैठा भला, जो कुछ साधन होय।।

अर्थ :- बहता हुआ पानी निर्मल और स्वच्छ है किन्तु रुका हुआ पानी भी स्वच्छ हो सकता है यदि थोडा गहरा हो इसी तरह बैठे हुए साधु भी अच्छे हो सकते हैं यदि वे साधना की गहराई से परिपूर्ण हो अर्थात ध्यान भजन, पूजा पाठ का ज्ञान हो.

बहुत जतन करि कीजिए, सब फल जाय न साय।
कबीर संचै सूम धन, अन्त चोर लै जाय।।

अर्थ :- कबीरदास जी कहते है कि कठिन परिश्रम करके संग्रह किया गया धन अन्त में नष्ट हो जाता है जैसे कंजूस व्यक्ति जीवन भार पाई पाई करके धन जोड़ता है अन्त में उसे चोर चुरा ले जाता है अर्थात वह उस धन का उपयोग भी नहीं कर पाता.

यह तन कांचा कुंभ है, लिया फिरै थे साथ।
टपका लागा फुटि गया, कछु न आया हाथ।।

अर्थ :- यह शरीर मिटटी के कच्चे घड़े के समान है जिसे हम अपने साथ लिये फिरते है और काल रूपी पत्थर का एक ही धक्का लगा, मिटटी का शरीर रूपी घड़ा फुट गया. हाथ कुछ भी न लगा अर्थात सारा अहंकार बह गया। खाली हाथ रह गये.

कोई आवै भाव लै, कोई अभाव ले आव।
साधु दोऊ को पोषते, भाव न गिनै अभाव।।

अर्थ :- कोई व्यक्ति श्रद्धा और प्रेम भाव लेकर संतों के निकट जाता है तो कोई बिना भाव के जाता है. किन्तु संतजनों की दृष्टि में कोई अन्तर नहीं पड़ता वे दोनों को समान दृष्टी से देखते है. न तो वे किसी के प्रेम भाव को गिनते है और न ही अभाव को अर्थात अपनी दया दृष्टी से दोनों को पोषण करते हैं.

काल पाय जग उपजो, काल पाय सब जाय।
काल पाय सब बिनसिहैं, काल काल कहं खाय।।

अर्थ :- काल के क्रमानुसार प्राणी की उत्पत्ति होती है और काल के अनुसार सब मिट जाते हैं. समय चक्र के अनुसार निश्चित रुप से नष्ट होना होगा क्योंकि काल से निर्मित वस्तु अन्ततः कालमें ही विलीन हो जाते हैं.

प्रेम पियाला सो पिये, शीश दच्छिना देय।
लोभी शीश न दे सकै, नाम प्रेम का लेय।।

अर्थ :- प्रेम का प्याला वही प्रेमी पी सकता है जो गुरु को दक्षिणा स्वरूप अपना शीश काटकर अर्पित करने को सामर्थ्य रखता हो. कोई लोभी, संसारी कामना में लिप्त मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता वह केवल प्रेम का नाम लेता है. प्रेम कि वास्तविकता का ज्ञान उसे नहीं है.

कागा कोका धन हरै, कोयल काको देत।
मीठा शब्द सुनाय के, जग अपनो करि लेत।।

अर्थ :- कौवा किसी का धन नहीं छीनता और न कोयल किसी को कुछ देती है किन्तु कोयल कि मधुर बोली सबको प्रिय लगती है. उसी तरह आप कोयल के समान अपनी वाणी में मिठास का समावेश करके संसार को अपना बना लो.

जाका गुरु है आंधरा, चेला खरा निरंध।
अनेधे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।।

अर्थ :- यदि गुरु ही अज्ञानी है तो शिष्य ज्ञानी कदापि नहीं हो सकता अर्थात शिष्य महा अज्ञानी होगा जिस तरह अन्धे को मार्ग दिखाने वाला अन्धा मिल जाये वही गति होती है. ऐसे गुरु और शिष्य काल के चक्र में फंसकर अपना जीवन व्यर्थ गंवा देते है.

भक्ति कठिन अति दुर्लभ, भेश सुगम नित सोय।
भक्ति जु न्यारी भेष से, यह जानै सब कोय।।

अर्थ :- सच्ची भक्ति का मार्ग अत्यन्त कठिन है. भक्ति मार्ग पर चलने वाले को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है किन्तु भक्ति का वेष धारण करना बहुत ही आसान है. भक्ति साधना और वेष धारण करने में बहुत अन्तर है. भक्ति करने के लिए ध्यान एकाग्र होना आवश्यक है जबकि वेष बाहर का आडम्बर है.

सांचै कोई न पतीयई, झूठै जग पतियाय।
पांच टका की धोपती, सात टकै बिक जाय।।

अर्थ :- बोलने पर कोई विश्वास नहीं करता, सरे संसार के लोग बनावटीपण लिये हुए झूठ पर आँखे बन्द करके विश्वास करते है जिस प्रकार पाँच तर्क वाली धोती को झूठ बोलकर दुकानदार सात टके में बेच लेता है.

अपने अपने चोर को, सब कोय डारै मार।
मेरा चोर मुझको मिलै सरबस डारु वार।।

अर्थ :- संसार के लोग अपने अपने चोर को मार डालते है परन्तु मेरा जो मन रूपी चंचल चोर है यदि वह मुझे मिल जाये तो मैं उसे नहीं मारुगा बल्कि उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दूँगा अर्थात मित्र भाव से प्रेम रूपी अमृत पिलाकर अपने पास रखूँगा.

साधु संगत परिहरै, करै विषय को संग।
कूप खनी जल बावरे, त्याग दिया जल गंग।।

अर्थ :- जो मनुष्य ज्ञानी सज्जनों की संगति त्यागकर कुसंगियो की संगति करता है वह सांसारिक सुखो की प्राप्ती के लिए सदा प्रयत्नशील रहता है. वह ऐसे मूर्ख की श्रेणी में आता है जो बहते हुए गंगा जल को छोड़ कर कुआँ खुदवाता हो.

कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खंड।
सद्गुरु की किरपा भई, नातर करती भांड।।

अर्थ :- माया के स्वरुप का वर्णन करते हुए संत कबीर दास जी कहते है कि माया बहुत ही लुभावनी है. जिस प्रकार मीठी खांड अपनी मिठास से हर किसी का मन मोह लेती है उसी प्रकार माया रूपी मोहिनी अपनी ओर सबको आकर्षित कर लेती है. वह तो सद्गुरु की कृपा थी कि हम बच गये अन्यथा माया के वश में होकर अपना धर्म कर्म भूलकर भांड की तरह रह जाते.

भक्ति भेष बहु अन्तरा, जैसे धरनि आकाश।
भक्त लीन गुरु चरण में, भेष जगत की आश।।

अर्थ :- भक्ति और वेश में उतना ही अन्तर है जितना अन्तर धरती और आकाश में है. भक्त सदैव गुरु की सेवा में मग्न रहता है उसे अन्य किसी ओर विचार करने का अवसर ही नहीं मिलता किन्तु जो वेशधारी है अर्थात भक्ति करने का आडम्बर करके सांसारिक सुखो की चाह में घूमता है वह दूसरों को तो धोखा देता ही है, स्वयं अपना जीवन भी व्यर्थ गँवाता है.

भक्ति पदारथ तब मिले, जब गुरु होय सहाय।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है कि भक्ति रूपी अनमोल तत्व की प्राप्ति तभी होती है जब जब गुरु सहायक होते है, गुरु की कृपा के बिना भक्ति रूपी अमृत रस को प्राप्त कर पाना पूर्णतया असम्भव है.

भक्तन की यह रीति है, बंधे करे जो भाव।
परमारथ के कराने, यह तन रहो कि जाव।।

अर्थ :- भक्तो की यह रीति है वे अपने मन एवम इन्द्रिय को पूर्णतया अपने वश में करके सच्चे मन से गुरु की सेवा करते है. लोगो के उपकार हेतु ऐसे सज्जन प्राणी अपने शारीर की परवाह नहीं करते। शारीर रहे अथवा मिट जाये परन्तु अपने सज्जनता रूपी कर्तव्य से विमुख नहीं होते.

और कर्म सब कर्म है, भक्ति कर्म निह्कर्म।
कहै कबीर पुकारि के, भक्ति करो ताजि भर्म।।

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है कि आशक्ति के वश में होकर जीव जो कर्म करता है उसका फल भी उसे भोगना पड़ता है किन्तु भक्ति ऐसा कर्म है जिसके करने से जीव संसार के भाव बन्धन से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होता है अतः हे सांसारिक जीवों. आशक्ति, विषय भोगों को त्यागकर प्रेमपूर्वक भक्ति करो जिससे तुम्हारा सब प्रकार से कल्याण होगा.

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढि गढि काढैं खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।।

अर्थ :- संसारी जीवों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं- गुरु कुम्हार है और शिष्य मिट्टी के कच्चे घडे के समान है. जिस तरह घडे को सुंदर बनाने के लिए अंदर हाथ डालकर बाहर से थाप मारता है ठीक उसी प्रकार शिष्य को कठोर अनुशासन में रखकर अंतर से प्रेम भावना रखते हुए शिष्य की बुराईयो कों दूर करके संसार में सम्माननीय बनाता है.

गुरु मुरति आगे खडी, दुतिया भेद कछु नाहि।
उन्ही कूं परनाम करि, सकल तिमिर मिटी जाहिं।।

अर्थ :- आत्म ज्ञान से पूर्ण संत कबीर जी कहते हैं – हे मानव. साकार रूप में गुरु कि मूर्ति तुम्हारे सम्मुख खडी है इसमें कोई भेद नहीं. गुरु को प्रणाम करो, गुरु की सेवा करो। गुरु दिये ज्ञान रुपी प्रकाश से अज्ञान रुपी अंधकार मिट जायेगा.

जैसी प्रीती कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय।
कहैं कबीर ता दास का, पला न पकडै कोय।।

अर्थ :- हे मानव, जैसा तुम अपने परिवार से करते हो वैसा ही प्रेम गुरु से करो। जीवन की समस्त बाधाएँ मिट जायेंगी. कबीर जी कहते हैं कि ऐसे सेवक की कोई मायारूपी बन्धन में नहीं बांध सकता, उसे मोक्ष प्राप्ती होगी, इसमें कोई संदेह नहीं.

कबीर यह तन जात है, सकै तो ठौर लगाव।
कै सेवा कर साधु की, कै गुरु के गुन गाव।।

अर्थ :- अनमोल मनुष्य योनि के विषय में ज्ञान प्रदान करते हुए सन्त जी कहते है कि हे मानव! यह मनुष्य योनि समस्त योनियों उत्तम योनि है और समय बीतता जा रहा है कब इसका अन्त आ जाये , कुछ नहीं पता. बार बार मानव जीवन नहीं मिलता अतः इसे व्यर्थ न गवाँओ. समय रहते हुए साधना करके जीवन का कल्याण करो. साधु संतों की संगति करो, सद्गुरु के ज्ञान का गुण गावो अर्थात भजन कीर्तन और ध्यान करो.

भक्ति दुवारा सांकरा, राई दशवे भाय।
मन तो मैंगल होय रहा, कैसे आवै जाय।।

अर्थ :- मानव जाति को भक्ति के विषय में ज्ञान का उपदेश करते हुए कबीरदास जी कहते है कि भक्ति का द्वार बहुत संकरा है जिसमे भक्त जन प्रवेश करना चाहते है. इतना संकरा कि सरसों के दाने के दशवे भाग के बरोबर है. जिस मनुष्य का मन हाथी की तरह विशाल है अर्थात अहंकार से भरा है वह कदापि भक्ति के द्वार में प्रवेश नहीं कर सकता.

जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल।
तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल।।

अर्थ :- जो व्यक्ति आपके लिए कांटे बोता है, आप उसके लिए फूल बोइये. आपके आस-पास फूल ही फूल खिलेंगे जबकि वह व्यक्ति काँटों में घिर जाएगा.

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ :- इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता.

कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार।
साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।।

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कटु वचन बहुत बुरे होते हैं और उनकी वजह से पूरा बदन जलने लगता है. जबकि मधुर वचन शीतल जल की तरह हैं और जब बोले जाते हैं तो ऐसा लगता है कि अमृत बरस रहा है.

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर।।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन. शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं.

पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय।
कबहुं छेड़ि न देखिये, हंसि हंसि खावे रोय।।

अर्थ :- संत कबीर दास जी कहते हैं कि दूसरे की स्त्री को अपने लिये पैनी छुरी ही समझो. उससे तो कोई विरला ही बच पाता है. कभी पराई स्त्री से छेड़छाड़ मत करो. वह हंसते हंसते खाते हुए रोने लगती है.

मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।।

अर्थ :- संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं.

सौं बरसां भक्ति करै, एक दिन पूजै आन।
सौ अपराधी आतमा, पड़ै चैरासी खान।।

अर्थ :- कई बरस तक भगवान के किसी स्वरूप की भक्ति करते हुए किसी दिन दुविधा में पड़कर उसके ही किसी अन्य स्वरूप में आराधना करना भी ठीक नहीं है. इससे पूर्व की भक्ति के पुण्य का नाश होता है और आत्मा अपराधी होकर चैरासी के चक्कर में पड़ जाती है.

गुरु सों ज्ञान जु लीजिए, सीस दीजिए दान।
बहुतक भोंदु बहि गये, राखि जीव अभिमान।।

अर्थ :- सच्चे गुरु की शरण मे जाकर ज्ञान-दीक्षा लो और दक्षिणा स्वरूप अपना मस्तक उनके चरणों मे अर्पित करदो अर्थात अपना तन मन पूर्ण श्रद्धा से समर्पित कर दो. “गुरु-ज्ञान कि तुलना मे आपकी सेवा समर्पण कुछ भी नहीं है” ऐसा न मानकर बहुत से अभिमानी संसार के माया-रुपी प्रवाह मे बह गये. उनका उद्धार नहीं हो सका.

गुरु गोविंद करी जानिए, रहिए शब्द समाय।
मिलै तो दण्डवत बन्दगी, नहीं पलपल ध्यान लगाय।।

अर्थ :- ज्ञान के प्रकाश का विस्तार करते हुए संत कबीर कहते हैं – हे मानव। गुरु और गोविंद को एक समान जाने. गुरु ने जो ज्ञान का उपदेश किया है उसका मनन कारे और उसी क्षेत्र मे रहें. जब भी गुरु का दर्शन हो अथवा न हो तो सदैव उनका ध्यान करें जिससे तुम्हें गोविंद दर्शन करणे का सुगम (सुविधाजनक) मार्ग बताया.

गुरु समान दाता नहीं, याचक सीष समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दिन्ही दान।।

अर्थ :- संपूर्ण संसार में गुरु के समान कोई दानी नहीं है और शिष्य के समान कोई याचक नहीं है. ज्ञान रुपी अमृतमयी अनमोल संपती गुरु अपने शिष्य को प्रदान करके कृतार्थ करता है और गुरु द्वारा प्रदान कि जाने वाली अनमोल ज्ञान सुधा केवळ याचना करके ही शिष्य पा लेता है.

भक्ति जुसिढी मुक्ति की, चढ़े भक्त हरषाय।
और न कोई चढ़ी सकै, निज मन समझो आय।।

अर्थ :- भक्ति वह सीधी है जिस पर चढ़ने के लिए भक्तो के मन में आपार ख़ुशी होती है क्योंकि भक्ति हो मुक्ति का साधन है। भक्तों के अतिरिक्त इस पर एनी कोई नहीं चढ़ सकता। ऐसा अपने मन में निश्चित कर लो।

कबीर हरि के रुठते, गुरु के शरणै जाय।
कहै कबीर गुरु रुठते , हरि नहि होत सहाय।।

अर्थ :- प्राणी जगत को सचेत करते हुए कहते हैं – हे मानव, यदि भगवान तुम से रुष्ट होते है तो गुरु की शरण में जाओ । गुरु तुम्हारी सहायता करेंगे अर्थात सब संभाल लेंगे किन्तु गुरु रुठ जाये तो हरि सहायता नहीं करते जिसका तात्पर्य यह है कि गुरु के रुठने पर कोई सहायक नहीं होता।

विषय त्याग बैराग है, समता कहिये जान।
सुखदायी सब जीव सों, यही भक्ति परमान।।

अर्थ :- कबीर दास जी संसारी जीवो को सन्मार्ग की शिक्षा देते हुए कहते है की पाँचों विषयों को त्यागना ही वैराग्य है। भेद भाव आदि दुर्गुणों से रहित होकर समानता का व्यवहार करना ही परमज्ञान है और स्नेह, उचित आचरण भक्ति का सत्य प्रमाण है। भक्तों में ये सद्गुण विद्यमान होते है।

तिमिर गया रवि देखते, कुमति गयी गुरु ज्ञान।
सुमति गयी अति लोभते, भक्ति गयी अभिमान।।

अर्थ :- जिस प्रकार सूर्य उदय होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है उसी प्रकार सद्गुरु के ज्ञान रूपी उपदेश से कुबुद्धि नष्ट हो जाती है। अधिक लोभ करने से बुद्धि नष्ट हो जाती है। और अभिमान करने से भक्ति का नाश हो जाता है अतः लोभ आदि से बचकर रहना ही श्रेयस्कर है।

कह आकाश को फेर है , कह धरती को तोल।
कहा साधु की जाति है, कह पारस का मोल।।

अर्थ :- आकाश की गोलाई , धरती का भार , साधु सन्तो की जाति क्या है तथा पारसमणि का मोल क्या है? कबीर जी कहते है कि इनका अनुमान लगा पाना असम्भव है अतः ऐसी चीजों के चक्कर में न पड़कर सत्य ज्ञान का अनुसरण करिये जिससे परम कल्याण निहित है।

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

जंगल ढेरी राख की, उपरि उपरि हरियाय।
ते भी होते मानवी, करते रंग रलियाय।।

अर्थ :- जब मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो उसके मृतक शरीर को जला देते है। शरीर जल जाने के बाद वहाँ राख की ढेरी मात्र बचती है जिस पर हरी हरी घास उग जाती है। जरा शान्त मन से विचार करो कि वे भी मनुष्य थे जो रास रंग, आमोद प्रमोद में विलास करते थे और आज उनके जल चुके शरीर की अवशेष राख पर घास उग आयी है।

जरा आय जोरा किया, नैनन दीन्ही पीठ।
आंखो ऊपर आंगुली, वीष भरै पछनीठ।।

अर्थ :- वृध्दावस्था ऊपर आई तो उसने अपना जोर दिखाया , कमजोर शरीर के साथ आँखों ने पीठ फेर ली अर्थात कम दिखायी पड़ने लगा। यहाँ तक कि आँखों के ऊपर अंगुलियों की छाया करने पर बहुत थोडा सा दिखायी पड़ता है।

झीनी माया जिन तजी, मोटी गई बिलाय।
ऐसे जन के निकट से, सब दुःख गये हिराय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है कि जिसने सूक्ष्म माया का त्याग कर दिया, जिसने मन की आसक्ति रूपी सूक्ष्म माया से नाता तोड़ लिया उसकी मोटी माया स्वतः ही नष्ट हो जाती है और वह ज्ञान रूपी अमृत पाकर सुखी हो जाता है। उसके समस्त दुःख दूर चले जाते है अतः सूक्ष्म माया को दूर भगाने का प्रयत्न करना चाहिए।

माया दोय प्रकार की, जो कोय जानै खाय।
एक मिलावै राम को, एक नरक ले जाय।।

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीर जी कहते है कि माया के दो स्वरुप है। यदि कोई इसका सदुपयोग देव सम्पदा के रूप में करे तो जीवन कल्याणकारी बनता है किन्तु माया के दूसरे स्वरुप अर्थात आसुरि प्रवृति का अवलम्बन करने पर जीवन का अहित होता और प्राणी नरक गामी होता है।

कबीर माया मोहिनी, मांगी मिलै न हाथ।
मना उतारी जूठ करु, लागी डोलै साथ।।

अर्थ :- कबीर जी के वचनासुनर माया अर्थात धन, सम्पति वैभव संसार के प्रत्येक प्राणी को मोहने वाली है तथा माँगने से किसी के हाथ नहीं आती। जो इसे झूठा समझकर , सांसारिक मायाजाल समझकर उतार फेंकता है उसके पीछे दौड़ी चली आती है तात्पर्य यह कि चाहने पर दूर भागती है और त्याग करने पर निकट आती है।

कबीर कमाई आपनी, कबहुं न निष्फल जाय।
सात समुद्र आड़ा पड़े, मिलै अगाड़ी आय।।

अर्थ :- कबीर साहेब कहते है कि कर्म की कमाई कभी निष्फल नहीं होती चाहे उसके सम्मुख सात समुद्र ही क्यों न आ जाये अर्थात कर्म के वश में होकर जीव सुख एवम् दुःख भोगता है अतः सत्कर्म करें।

जहां काम तहां नहिं, जहां नाम नहिं काम।
दोनों कबहू ना मिलै, रवि रजनी इक ठाम।।

अर्थ :- जहाँ विषय रूपी काम का वस् होता है उस स्थान पर सद्गुरु का नाम एवम् स्वरुप बोध रूपी ज्ञान नहीं ठहरता और जहाँ सद्गुरु का निवास होता है वहाँ काम के लिए स्थान नहीं होता जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश और रात्रि का अंधेरा दोनों एक स्थान पर नहीं रह सकते उसी प्रकार ये दोनों एक साथ नहीं रह सकते।

कामी का गुरु कामिनी, लोभी का गुरु दाम।
कबीर का गुरु सन्त है, संतन का गुरु राम।।

अर्थ :- कुमार्ग एवम् सुमार्ग के विषय में ज्ञान की शिक्षा प्रदान करते हुए महासन्त कबीर दास जी कहते है कि कामी व्यक्ति कुमार्गी होता है वह सदैव विषय वासना के सम्पत्ति बटोर ने में ही ध्यान लगाये रहता है। उसका गुरु, मित्र, भाई – बन्धु सब कुछ धन ही होता है और जो विषयों से दूर रहता है उसे सन्तो की कृपा प्राप्त होती है अर्थात वह स्वयं सन्तमय होता है और ऐसे प्राणियों के अन्तर में अविनाशी भगवान का निवास होता है । दूसरे अर्थो में भक्त और भगवान में कोई भेद नहीं।

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना।
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई।
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है। पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास।
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास।।

अर्थ :- यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं। सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है।

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए। बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।

कबीर पांच पखेरुआ, राखा पोश लगाय।
एक जू आया पारधी, लगइया सबै उड़ाय।।

अर्थ :- सन्त शिरोमणि कबीर दस जी कहते है कि अपान, उदान, समान, व्यान और प्राण रूपी पांच पक्षियों को मनुष्य अन्न जल आदि पाल पोषकर सुरक्षित रखा किन्तु एक दिन काल रूपी शिकारी उड़ाकर अपने साथ ले गया अर्थात मृत्यु हो गयी।

कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस।
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस।।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि हे मानव! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है। मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले।

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

अर्थ :- इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात।
एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात।।

अर्थ :- कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है। जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी।

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस।
भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस।।

अर्थ :- कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता।

मूलध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पांव।
मूल नाम गुरु वचन है, मूल सत्य सत भाव।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है – ध्यान का मूल रूप गुरु हैं अर्थात सच्चे मन से सदैव गुरु का ध्यान करना चाहिये और गुरु के चरणों की पूजा करनी चाहिये और गुरु के मुख से उच्चारित वाणी को ‘सत्यनाम’ समझकर प्रेमभाव से सुधामय अमृतवाणी का श्रवण करें अर्थात शिष्यों के लिए एकमात्र गुरु ही सब कुछ हैं।

प्रेम बिना जो भक्ती ही सो निज दंभ विचार।
उदर भरन के कारन, जन्म गंवाये सार।।

अर्थ :- प्रेम के बिना की जाने वाली भक्ती, भक्ती नहीं बल्की पाखंड ही । वाहय आडम्बर है। प्रदर्शन वाली भक्ति को स्वार्थ कहते है जो पेट पालने के लिए करते है। सच्ची भक्ति के बिना सब कुछ व्यर्थ है। भक्ति का आधार प्रेम है अतः प्रेम पूर्वक भक्ति करे जिससे फल प्राप्त हो।

भक्ति निसैनी मुक्ति की, संत चढ़े सब धाय।
जिन जिन मन आलस किया , जनम जनम पछिताय।।

अर्थ :- मुक्ति का मूल साधन भक्ति है इसलिए साधू जन और ज्ञानी पुरुष इस मुक्ति रूपी साधन पर दौड़ कर चढ़ते है। तात्पर्य यह है कि भक्ति साधना करते है किन्तु जो लोग आलस करते है। भक्ति नहीं करते उन्हें जन्म जन्म पछताना पड़ता है क्योंकि यह सुअवसर बार बार नहीं अता।

गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागुं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।

अर्थ :- गुरु और गोविंद (भगवान) दोनो एक साथ खडे हो तो किसे प्रणाम करणा चाहिये – गुरु को अथवा गोविंद को। ऐसी स्थिती में गुरु के श्रीचरणों मे शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा रुपी प्रसाद से गोविंद का दर्शन प्राप्त करणे का सौभाग्य हुआ।

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

 

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।
पाछे फिर पछ्ताओगे, प्राण जाहि जब छूट॥

अर्थ :- कबीर दस जी कहते हैं कि अभी राम नाम की लूट मची है , अभी तुम भगवान् का जितना नाम लेना चाहो ले लो नहीं तो समय निकल जाने पर, अर्थात मर जाने के बाद पछताओगे कि मैंने तब राम भगवान् की पूजा क्यों नहीं की।

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय॥

अर्थ :- कबीर दास जी कहते हैं कि दुःख के समय सभी भगवान् को याद करते हैं पर सुख में कोई नहीं करता। यदि सुख में भी भगवान् को याद किया जाए तो दुःख हो ही क्यों!

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगो कब।।

अर्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और जो आज करना है उसे अभी करो। जीवन बहुत छोटा होता है अगर पल भर में समाप्त हो गया तो क्या करोगे।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ :- बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।।

अर्थ :- इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय।
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है!

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।।

अर्थ :- मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा!

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।

अर्थ :- कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।

अर्थ :- सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त।
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।।

अर्थ :- यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत।

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

अर्थ :- जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।।

अर्थ :- यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

क्रिया करै अंगूरी गिनै, मन धावै चहु ओर।
जिहि फेरै सांई मिलै, सों भय काठ कठोर।।

अर्थ :- जप करते समय अंगुली पर जप की गणना करते है कि मैंने कितनी बार नाम पाठ किया किन्तु उस समय भी उनका चंचल मन चारों ओर दौड़ता है, स्थिर नहीं रहता। ऐसे सुमिरन से क्या लाभ? जब तुम अपने मन रूपी मयूर को स्थिर नहीं रख सकते तप अविनाशी प्रभु रम के दर्शन की इच्छा कैसे करते हो? मन तो सुखी लकड़ी के समान कठोर हो गया है अर्थात प्रभु के दर्शनों के लिए मन को शुद्ध करना होगा तथा मन की चंचलता को रोकना होगा।

यह मन ताको दीजिए, सांचा सेवक होय।
सर ऊपर आरा सहै, तऊ न दूजा होय।।

अर्थ :- अपना सत्य ज्ञान रुपी अमृत उसको प्रदान करें जो सेवा करना जानता हो अर्थात् सच्चे सेवक को ज्ञान दें। यदि सिर के ऊपर आरा भी चलता है तो वह प्रसन्नपूर्वक सहन कर लें। तात्पर्य यह कि निष्ठापूर्वक सेवा करने वाले ही ज्ञान प्राप्त करने के पात्र है।

तन मन ताको दीजिए, जाको विषय नाहिं।
आपा सब ही डारि के, राखै साहिब मांहि।।

अर्थ :- अपना तन मन उस गुरु के चरणों में अर्पित करें जो संसारिक विषय विकारों से मुक्त हो। जो पूर्ण रूप से अहंकार मुक्त और आत्मतत्व का ज्ञाता हो। ऐसे गुरु ही आत्म साक्षात्कार कैरा सकते है।

अधिक सनेही माछरी, दूजा अपल सनेह।
जबहि जलते बिछुरै, तब ही त्यागै देह।।

अर्थ :- मछली का बहुत अधिक प्रेम जल से होता है। उसके समान प्रेमी कम ही मिलते हैं। मछली जब भी जल से बिछुडती है, वह तडप तडप कर जल के लिए अपने प्राण त्याग देती है। ठीक मछली की भांति सच्चा प्रेम करना चाहिए।

सुमिरण मारग सहज का, सतगुरु दिया बताय।
सांस सांस सुमिरण करूं, इक दिन मिलसी आय।।

अर्थ :- सुमरीन करने का बहुत ही सरल मार्ग सद्गुरू ने बता दिया है। उसी मार्ग पर चलते हुए मैं सांस सांस में परमात्मा का सुमिरन करता हूं जिससे मुझे एक दिन उनके दर्शन निश्चित ही प्राप्त होगें। अर्थात् सुमिरन प्रतिदिन की साधना हैं जो भक्त को उसके लक्ष्य की प्राप्ति करती है।

बिना सांच सुमिरन नहीं, बिन भेदी भक्ति न सोय।
पारस में परदा रहा, कस लोहा कंचन होय।।

अर्थ :- बिना सत्य ज्ञान के सुमिरन नहीं होता, बिना गुरु के भक्ति नहीं होती अर्थात् सद्गुरू के बिना सार रहस्य कौन बताये और बताये जब तक सार रहस्य का ज्ञान नहीं होता सुमिरन करना निरर्थक है जैसे पारसमणि पर परदा पडा है तो उसके स्पर्श से लोहा कदापि सोना नहीं बन सकता। वह परदा ही दोष है उसी प्रकार यदि मन में, ज्ञान का अभाव है तो साधना सफल नहीं हो सकता।

बालपन भोले गया, और जुवा महमंत।
वृध्दपने आलस गयो, चला जरन्ते अन्त।।

अर्थ :- बाल्यकाल भोलेपन में व्यतीत हो गया अर्थात् अनजान अवस्था में बीत गया युवावस्था आयी तो विषय वासनाओं में गुजार दिया तथा वृद्धावस्था आई तो आलस में बीत गयी और अन्त समय में मृत्यु हो गयी और शरीर चिता पर जलने के लिए तैयार है।

 

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

जनोता बूझा नहीं, बुझि किया नहीं गौन।
अंधे को अंधा मिला, राह बतावै कौन।।

अर्थ :- जो सद्गुरू की शरण में पहुँचे कर भी सन्मार्ग पर नहीं चला। कल्याण का मार्ग सन्मुख होते हुए भी आगे नहीं बढा अर्थात् जान बूझकर उसने भूल कि उसके बाद ऐसे व्यक्ति से मिला जो स्वयं अज्ञानी था। तो फिर मार्ग कौन बताये क्योंकि दोनों अंधकार रुपी अंधेपन के कारण भटक रहे थे।

रक्त छोड़ पय हो गहै, ज्यौरे गऊ का बच्छ।
औगुण छांडै गुण गहै, ऐसा साधु का लच्छ।।

अर्थ :- गाय के थन में दूध और खून दोनों होता है किन्तु बछड़ा जब मुंह लगाता है तो वह खून नहीं पीता बल्कि सिर्फ दूध ही ग्रहण करता है ठीक ऐसे ही लक्षण से साधुजन परिपूर्ण होते हैं। वे दूसरों के अवगुणों को ग्रहण नहीं करते उनके सद्गुणों को ही धारण करते है।

सब वन तो चन्दन नहीं, शुरा के दल नाहिं।
सब समुद्र मोती नहीं, यों साधू जग माहिं।।

अर्थ :- सारा वन चन्दन नहीं होता, सभी दल शूरवीरों के नहीं होते, सारा समुद्र मोतियों से नहीं भरा होता इसी प्रकार संसार में ज्ञानवान विवेकी और सिद्ध पुरुष बहुत कम होते है।

आसन तो एकान्त करै, कामिनी संगत दूर।
शीतल संत शिरोमनी, उनका ऐसा नूर।।

अर्थ :- संतों का कहना है कि आसन एकान्त में लगाना चाहिए और स्त्री, की संगत से दूर रहना चाहिए। सन्तों का मधुर स्वभाव ऐसा होता है कि वे सबके पूज्य और शिरोमणि होते है।

शीलवन्त सुर ज्ञान मत, अति उदार चित होय।
लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय।।

अर्थ :- सद्गुरु की सेवा करने वाले शीलवान, ज्ञानवान और उदार ह्रदय वाले होते हैं और लज्जावान बहुत ही निश्छल स्वभाव और कोमल वाले होते है।

कबीर गुरु सबको चहै , गुरु को चहै न कोय।
जब लग आश शरीर की, तब लग दास न होय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है कि सबको कल्याण करने के लिए गुरु सबको चाहते है किन्तु गुरु को अज्ञानी लोग नहीं चाहते क्योंकि जब तक मायारूपी शरीर से मोह है तह तक प्राणी सच्चा दास नहीं हो सकता।

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जो रुचै, शीश देय ले जाय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है कि प्रेम की फसल खेतों में नहीं उपजती और न ही बाजारों में बिकती है अर्थात यह व्यापार करने वाली वास्तु नहीं है। प्रेम नामक अमृत राजा रंक, अमीर – गरीब जिस किसी को रुच कर लगे अपना शीश देकर बदले में ले।

साधु सीप समुद्र के, सतगुरु स्वाती बून्द।
तृषा गई एक बून्द से, क्या ले करो समुन्द।।

अर्थ :- साधु सन्त एवम ज्ञानी महात्मा को समुद्र की सीप के समान जानो और सद्गुरु को स्वाती नक्षत्र की अनमोल पानी की बूंद जानो जिसकी एक बूंद से ही सारी प्यास मिट गई फिर समुद्र के निकट जाने का क्या प्रयोजन। सद्गुरु के ज्ञान उपदेश से मन की सारी प्यास मिट जाती है।

आठ पहर चौसंठ घड़ी, लगी रहे अनुराग।
हिरदै पलक न बीसरें, तब सांचा बैराग।।

अर्थ :- आठ प्रहर और चौसंठ घड़ी सद्गुरु के प्रेम में मग्न रहो अर्थ यह कि उठते बैठते, सोते जागते हर समय उनका ध्यान करो। अपने मन रूपी मन्दिर से एक पल के लिए भी अलग न करो तभी सच्चा बैराग्य है।

सुमिरण की सुधि यौ करो, जैसे कामी काम।
एक पल बिसरै नहीं, निश दिन आठौ जाम।।

अर्थ :- सुमिरण करने का उपाय बहुत ही सरल है किन्तु मन को एकाग्र करके उसमें लगाना अत्यन्त कठिन है। जिस तरह कामी पुरुष का मन हर समय विषय वासनाओं में लगा रहता है उसी तरह सुमिरण करने के लिए ध्यान करो। एक पल भी व्यर्थ नष्ट मत करो। सुबह, शाम, रात आठों पहर सुमिरण करो।

सुमिरण की सुधि यौ करो, ज्यौं गागर पनिहारि।
हालै डीलै सुरति में, कहैं कबीर बिचारी।।

अर्थ :- संत कबीर जी सुमिरण करने की विधि बताते हुए कहते है कि सुमिरन इस प्रकार करो जैसे पनिहार न अपनी गागर का करती है। गागर को जल से भरकर अपने सिर पर रखकर चलती है। उसका समूचा शरीर हिलता डुलता है किन्तु वह पानी को छलकने नहीं देती अर्थात हर पल उसे गागर का ध्यान रहता है उसी प्रकार भक्तों को सदैव सुमिरण करना चाहिए।

दया का लच्छन भक्ति है, भक्ति से होवै ध्यान।
ध्यान से मिलता ज्ञान है, यह सिद्धान्त उरान।।

अर्थ :- दया का लक्षण भक्ति है और श्रद्धा पूर्वक भक्ति करने से परमात्मा का ध्यान होता है। जो ध्यान करता है उसी को ज्ञान मिलता है यही सिद्धान्त है जो इस सिद्धान्त का अनुसरण करता है उसके समस्त क्लेश मिट जाते है।

दया धर्म का मूल है, पाप मूल संताप।
जहा क्षमा वहां धर्म है, जहा दया वहा आप।।

अर्थ :- परमज्ञानी कबीर दास जी अपनी वाणी से मानव जीवन को ज्ञान का उपदेश करते हुए कहते है। कि दया, धर्म की जड़ है और पाप युक्त जड़ दूसरों को दु:खी करने वाली हिंसा के समान है। जहा क्षमा है वहा धर्म का वास होता है तथा जहा दया है उस स्थान पर स्वयं परमात्मा का निवास होता है अतः प्रत्येक प्राणी को दया धर्म का पालन करना चाहिए।

तेरे अन्दर सांच जो, बाहर नाहिं जनाव।
जानन हारा जानि है, अन्तर गति का भाव।।

अर्थ :- तुम्हारे अन्दर जो सत्य भावना निहित है उसका प्रदर्शन मत करो। जो अन्तर गति का रहस्य जानने वाले ज्ञानी का प्रदर्शन करना उचित नहीं है।

कामी कबहूँ न गुरु भजै, मिटै न सांसै सूल।
और गुनह सब बख्शिहैं, कामी डाल न भूल।।

अर्थ :- कम के वशीभूत व्यक्ति जो सांसारिक माया में लिप्त रहता है वह कभी सद्गुरु का ध्यान नहीं करता क्योंकि हर घड़ी उसके मन में विकार भरा रहता है, उसके अन्दर संदेह रूपी शूल गड़ा रहता है जिस से उसका मनसदैव अशान्त रहता है। संत कबीर जी कहते हैं कि सभी अपराध क्षमा योग्य है किन्तु कामरूपी अपराध अक्षम्य है जिसके लिए कोई स्थान नहीं है।

धरती फाटै मेघ मिलै, कपडा फाटै डौर।
तन फाटै को औषधि , मन फाटै नहिं ठौर।।

अर्थ :- धरती फट गयी है अर्थात दरारे पड़ गयी है तो मेघों द्वारा जल बरसाने पर दरारें बन्द हो जाती हैं और वस्त्र फट गया है तो सिलाई करने पर जुड़ जाता है। चोट लगने पर तन में दवा का लेप किया जाता है जिससे शरीर का घाव ठीक हो जाता है किन्तु मन के फटने पर कोई औषधि या कोई उपाय कारगर सिद्ध नहीं होता।

माली आवत देखि के, कलियां करे पुकार।
फूली फूली चुन लई, काल हमारी बार।।

अर्थ :- माली को आता हुआ देखकर कलियां पुकारने लगी, जो फूल खिल चुके थे उन्हें माली ने चुन लिया और जो खिलने वाली है उनकी कल बारी है। फूलों की तरह काल रूपी माली उन्हें ग्रस लेता है जो खिल चुके है अर्थात जिनकी आयु पूर्ण हो चुकी है, कली के रूप में हम है हमारी बारी कल की है तात्पर्य यह कि एक एक करके सभी को काल का ग्रास बनना है।

झूठा सुख को सुख कहै, मानत है मन मोद।
जगत – चबेना काल का , कछु मूठी कछु गोद।।

अर्थ :- उपरी आवरण को, भौतिक सुख को सांसारिक लोग सुख मानते है और प्रसन्न होते है किन्तु यह सम्पूर्ण संसार काल का चबेना है। यहां कुछ काल की गेंद में है और कुछ उसकी मुटठी में है। वह नित्य प्रतिदिन सबको क्रमानुसार चबाता जा रहा है।

जरा कुत्ता जोबन ससा, काल आहेरी नित्त।
गो बैरी बिच झोंपड़ा, कुशल कहां सो मित्त।।

अर्थ :- मनुष्यों को सचेत करते हुए संत कबीर जी कहते है – हे प्राणी! वृद्धावस्था कुत्ता और युवा वस्था खरगोश के समान है। यौवन रूपी शिकार पर वृद्धावस्था रूपी कुत्ता घात लगाये हुए है। एक तरफ वृद्धावस्था है तो दूसरी ओर काल। इस तरह दो शत्रुओं के बीच तुम्हारी झोंपडी है। यथार्थ सत्य से परिचित कराते हुए संत जी कहते है कि इनसे बचा नहीं जा सकता।

मूसा डरपे काल सू, कठिन काल का जोर।
स्वर्ग भूमि पाताल में, जहां जाव तहं गोर।।

अर्थ :- काल की शक्ति अपरम्पार है जिससे मूसा जैसे पीर पैगम्बर भी डरते थे और उसी डर से मुक्ति पाने के लिए अल्लाह और खुदा की बन्दगी करते थे। स्वर्ग , पृथ्वी अथवा पाताल में, जहां कहीं भी जाइये। सर्वत्र काल अपना विकराल पंजा फैलाये हुए है।

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

 

मन गोरख मन गोविंद, मन ही औघड़ सोय।
जो मन राखै जतन करि, आपै करता होय।।

अर्थ :- मन ही योगी गोरखनाथ है, मन ही भगवान है, मन ही औघड़ है अर्थात मन को एकाग्र करके कठिन साधना करने से गोरखनाथ जी महान योगी हुए, मन की शक्ति से मनुष्य की पूजा भगवान की तरह होती है। मन को वश में करके जो भी प्राणी साधना स्वाध्याय करता है वह स्वयं ही अपना कर्त्ता बन जाती है।

कबीर माया बेसवा, दोनूं की इक जात।
आवंत को आदर करै, जात न बुझै बात।।

अर्थ :- माया और वेश्या इन दोनों की एक जात है, एक कर्म है। ये दोनों पहले प्राणी को लुभाकर पूर्ण सम्मान देते है परन्तु जाते समय बात भी नहीं करते।

कामी अमी न भावई, विष को लेवै सोध।
कुबुधि न भाजै जीव की , भावै ज्यौं परमोध।।

अर्थ :- विषय भोगी कामी पुरुष को कितना भी उपदेश दो, सदाचार और ब्रह्ममर्य आदि की शिक्षा दो उसे अच्छा नहीं लगता। वह सदा काम रूपी विष को ढूंढता फिरता है। चित्त की चंचलता से उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। जिसे कारण सद्गुणों को वह ग्रहण नहीं कर पाता है।

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
जनम जनम का मोरचा, पल में डारे धोय।।

अर्थ :- अज्ञान रूपी कीचड़ में शिष्य डूबा रहता है अर्थात शिष्य अज्ञान के अन्धकार में भटकता रहता है जिसे गुरु अपने ज्ञान रूपी जल से धोकर स्वच्छ कर देता है।

दीपक सुन्दर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग।
बढ़ी लहर जो विषय की, जरत न मारै अंग।।

अर्थ :- प्रज्जवलित दीपक की सुन्दर लौ को देख कर कीट पतंग मोह पाश में बंधकर उसके ऊपर मंडराते है ओर जल जलकर मरते है। ठीक इस प्रकार विषय वासना के मोह में बंधकर कामी पुरुष अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य से भटक कर दारुण दुःख भोगते है।

कबीर माया मोहिनी, सब जग छाला छानि।
कोई एक साधू ऊबरा, तोड़ी कुल की कानि।।

अर्थ :- सन्त कबीर जी कहते है कि यह जग माया मोहिनी है जो लोभ रूपी कोल्हू में पीसती है। इससे बचना अत्यंत दुश्कर है। कोई विरला ज्ञानी सन्त ही बच पाता है जिसने अपने अभिमान को तोड़ दिया है।

कबीर गुरु के देश में, बसि जानै जो कोय।
कागा ते हंसा बनै, जाति वरन कुल खोय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है कि जो सद्गुरु के देश में रहता है अर्थात सदैव सद्गुरु की सेवा में अपना जीवन व्यतीत करता है। उनके ज्ञान एवम् आदेशों का पालन करता है वह कौआ से हंस बन जाता है। अर्थात अज्ञान नष्ट हो जाता है और ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है। समस्त दुर्गुणों से मुक्त होकर जग में यश सम्मान प्राप्त करता है।

गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनों गये, आये सिर पर काल।।

अर्थ :- जो मनुष्य गुरु की आज्ञा की अवहेलना करके अपनी इच्छा से कार्य करता है। अपनी मनमानी करता है ऐसे प्राणी का लोक-परलोक दोनों बिगड़ता है और काल रूपी दु:खो से निरन्तर घिरा रहेगा।

गुरु आज्ञा लै आवही , गुरु आज्ञा लै जाय।
कहै कबीर सो सन्त प्रिय, बहु विधि अमृत पाय।।

अर्थ :- गुरु की आज्ञा लेकर आना और गुरु की आज्ञा से ही कहीं जाना चाहिए। कबीर दास जी कहते है किऐसे सेवक गुरु को अत्यन्त प्रिय होते है जिसे गुरु अपने ज्ञान रूपी अमृत रस का पान करा कर धन्य करते है।

गुरु समरथ सिर पर खड़े, कहा कमी तोहि दास।
रिद्धि सिद्धि सेवा करै, मुक्ति न छाडै पास।।

अर्थ :- जब समर्थ गुरु तुम्हारे सिर पर खड़े है अर्थात सतगुरु का आशिर्वाद युक्त स्नेहमयी हाथ तुम्हारे सिर पर है, तो ऐसे सेवक को किस वस्तु की कमी है। गुरु के श्री चरणों की जो भक्ति भाव से सेवा करता है उसके द्वार पर रिद्धि सिद्धिया हाथ जोड़े खड़ी रहती है।

प्रीति पुरानी न होत है, जो उत्तम से लाग।
सो बरसाजल में रहै, पथर न छोड़े आग।।

अर्थ :- यदि किसी सज्जन व्यक्ति से प्रेम हो तो चाले कितना भी समय व्यतीत हो जाये कभी पुरानी नहीं होती, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार पत्थर सैकड़ो वर्ष पानी में रहे फिर भी अपनी अग्नि उत्पन्न करने की क्षमता को नहीं त्यागता।

परारब्ध पहिले बना, पीछे बना शरीर।
कबीर अचम्भा है यही, मन नहिं बांधे धीर।।

अर्थ :- कबीर दास जी मानव को सचेत करते हुए कहते है कि प्रारब्ध की रचना पहले हुई उसके बाद शरीर बना। यही आश्चर्य होता है कि यह सब जानकर भी मन का धैर्य नहीं बंधता अर्थात कर्म फल से आशंकित रहता है।

काला मुंह करूं करम का, आदर लावू आग।
लोभ बड़ाई छांड़ि के, रांचू के राग।।

अर्थ :- लोभ एवम मोह रूपी कर्म का मुंह काला करके आदर सम्मान को आग लगा दूं। निरर्थक मान सम्मान प्राप्त करने के चक्कर में उचित मार्ग न भूल जाऊ। सद्गुरु के ज्ञान का उपदेश ही परम कल्याण कारी है अतः यही राग अलापना सर्वथा हितकर है।

दिन गरीबी बंदगी, साधुन सों आधीन।
ताके संग मै यौ रहूं, ज्यौं पानी संग मीन।।

अर्थ :- जिसमें विनम्रता प्रेम भाव, सेवा भाव तथा साधु संतो की शरण में रहने की श्रद्धा होती है उसके साथ मै इस प्रकार रहू जैसे पानी के साथ मछली रहती है।

कबीर या संसार की, झूठी माया मोह।
जिहि घर जिता बधावना, तिहि घर तेता दोह।।

अर्थ :- संसार के लोगों का यह माया मोह सर्वथा मिथ्या है। वैभव रूपी माया जिस घर में जितनी अधिक है वहा उतनी ही विपत्ति है अर्थात भौतिक सुखसम्पदा से परिपूर्ण जीव घरेलू कलह और वैरभाव से सदा अशान्त रहता है, दु:खी रहता है।

कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खंड।
सद्गुरु की किरपा भई, नातर करती भांड।।

अर्थ :- माया के स्वरुप का वर्णन करते हुए संत कबीर दास जी कहते है कि माया बहुत ही लुभावनी है। जिस प्रकार मीठी खांड अपनी मिठास से हर किसी का मन मोह लेती है उसी प्रकार माया रूपी मोहिनी अपनी ओर सबको आकर्षित कर लेती है। वह तो सद्गुरु की कृपा थी कि हम बच गये अन्यथा माया के वश में होकर अपना धर्म कर्म भूलकर भांड की तरह रह जाते।

माया छाया एक सी, बिरला जानै कोय।
भगता के पीछे फिरै, सनमुख भाजै सोय।।

अर्थ :- धन सम्पत्ति रूपी माया और वृक्ष की छाया को एक समान जानो। इनके रहस्य को विरला ज्ञानी ही जानता है। ये दोनों किसी की पकड़ में नहीं आती। ये दोनों चीज़े भक्तों के पीछे पीछे और कंजूसों के आगे आगे भागती है अर्थात वे अतृप्त ही रहते है।

मोटी माया सब तजै, झीनी तजी न जाय।
पीर पैगम्बर औलिया, झीनी सबको खाय।।

अर्थ :- धन संपत्ति, पुत्र, स्त्री, घर सगे सम्बन्धी अदि मोटी माया का बहुत से लोग त्याग कर देते है किन्तु माया के सूक्ष्म रूप यश सम्मान आदि का त्याग नहीं कर पाते है और यह छोटी माया ही जीव के दुखो का कारण बनती है। पीर पैगम्बर औलिया आदि की मनौती ही सबको खा जाती है।

माया काल की खानि है, धरै त्रिगुण विपरीत।
जहां जाय तहं सुख नहीं, या माया की रीत।।

अर्थ :- माया विपत्ति रूपी काल की वह खान है जो त्रिगुणमयी विकराल रूप धारण करती है यह जहाँ भी जाती है वहाँ सुख चैन का नाश हो जाता है और अशांति फैलती है। यही माया का वास्तविक रूप है। ज्ञानी जन मायारूपी काल से सदैव दूर रहते है।

माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि माहि परन्त।
कोई एक गुरु ज्ञानते, उबरे साधु सन्त।।

अर्थ :- माया, दीपक की लौ के समान है और मनुष्य उन पतंगों के समान है जो माया के वशीभूत होकर उन पर मंडराते है। इस प्रकार के भ्रम से, अज्ञान रूपी अन्धकार से कोई विरला ही उबरता है जिसे गुरु का ज्ञान प्राप्त होने से उद्धार हो जाता है।

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

 

काल हमारे संग है, कस जीवन की आस।
दस दिन नाम संभार ले, जब लग पिंजर सांस।।

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है कि जब काल हमारे साथ लगा हुआ है तो फिर जीने की आशा कैसी? यह जीवन मिथ्या है, जब तक शरीर में प्राण है तभी तक तुम्हारे पास अवसर है अतः इस अल्प जीवन में सतकर्म करके अपना परलोक सुधार लो।

हरिजन आवत देखि के, मोहड़े सुख गयो।
भाव भक्ति समुझयो नहीं, मूरख चूकि गयो।।

अर्थ :- हरी भक्तों को आता हुआ देखकर जिस मानव का मुख सूख गया अर्थात सेवा की भावना उत्पन्न ण हुई बल्कि विचलित हो गया। ऐसे व्यक्ति को महामूर्ख जानो। जिस ने हाथ आया सुअवसर खो दिया। सन्तो के दर्शन बार बार नहीं होते।

भक्ति दुलेही गुरून की, नहिं कायर का काम।
सीस उतारे हाथ सों, ताहि मिलै निज धाम।।

अर्थ :- सद्गुरु की भक्ति करना अत्यन्त ही कठिन कार्य है । यह कायरों के वश की बात नहीं है। यह एसे पुरुषार्थ का कार्य है कि जब अपने हाथ से अपना सिर काटकर गुरु के चरणों में समर्पित करोगे तभी मोक्ष को प्राप्त होओगे।

कबीर गुरु की भक्ति का, मन में बहुत हुलास।
मन मनसा मा जै नहीं, होन चहत है दास।।

अर्थ :- गुरु की भक्ति करने का मन में बहुत उत्साह है किन्तु ह्रदय को तूने शुद्ध नहीं किया। मन में मोह , लोभ, विषय वासना रूपी गन्दगी भरी पड़ी है उसे साफ़ और स्वच्छ करने का प्रयास ही नहीं किया और भक्ति रूपी दास होना चाहता है अर्थात सर्वप्रथम मन में छुपी बुराइयों को निकालकर मन को पूर्णरूप से शुद्ध करो तभी भक्ति कर पाना सम्भव है।

भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहिं भाव।
भक्ति भाव इक रूप है, दोऊ एक सुझाव।।

अर्थ :- भक्ति और भाव का निरूपण करते हुए सन्त शिरोमणि कबीर साहेब जी कहते है कि संसार में भाव के बिना भक्ति नहीं और निष्काम भक्ति के बिना प्रेम नहीं होता है भक्ति और भाव एक दुसरे के पूरक है अर्थात इनके बीच कोई भेद नहीं है। भक्ति एवम भाव के गुण, लक्षण , स्वभाव आदि एक जैसे है।

भक्ति पंथ बहु कठिन है, रत्ती न चालै खोट।
निराधार का खेल है, अधर धार की चोट।।

अर्थ :- भक्ति साधना करना बहुत ही कठिन है। इस मार्ग पर चलने वाले को सदैव सावधान रहना चाहिए क्योंकि यह ऐसा निराधार खेल है कि जरा सा चुकने पर रसातल में गिरकर महान दुःख झेलने होते है अतः भक्ति साधना करने वाले झूठ, अभिमान , लापरवाही आदि से सदैव दूर रहें।

देखा देखी भक्ति का, कबहू न चढ़सी रंग।
विपत्ति पड़े यों छाडसि, केचुलि तजसि भुजंग।।

अर्थ :- दूसरों को भक्ति करते हुए देखकर भक्ति करना पूर्ण रूप से सफल भक्ति नहीं हो सकती, जब कोई कठिन घडी आयेगी उस समय दिखावटी भक्ति त्याग देते है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सर्प केचुल का त्याग कर देता है।

भक्ति भक्ति सब कोई कहै, भक्ति न जाने भेद।
पूरण भक्ति जब मिलै, कृपा करै गुरुदेव।।

अर्थ :- भक्ति भक्ति तो हर कोई प्राणी कहता है किन्तु भक्ति का ज्ञान उसे नहीं होता, भक्ति का भेद नहीं जानता। पूर्ण भक्ति तभी प्राप्त हो सकती है जब गुरु देव की कृपा प्राप्त हो अतः भक्ति मार्ग पर चलने से पहले गुरु की शरण में जाना अति आवश्यक है। गुरु के आशिर्वाद और ज्ञान से मन का अन्धकार नष्ट हो जायेगा।

कबीर माया मोहिनी, भई अंधियारी लोय।
जो सोये सों मुसि गये, रहे वस्तु को रोय।।

अर्थ :- कबीर साहेब कहते है कि माया मोहिनी उस काली अंधियारी रात्रि के समान है जो सबके ऊपर फैली है। जो वैभव रूपी आनन्द में मस्त हो कर सो गये अर्थात माया रूपी आवरण ने जिसे अपने वश में कर लिया उसे काम, क्रोध और मोहरूपी डाकुओ ने लूट लिया और वे ज्ञान रूपी अमृत तत्व से वंचित रह गये।

गुरु को सर पर राखिये चलिये आज्ञा माहि।
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाहीं।।

अर्थ :- गुरु को अपने सिर का गज समझिये अर्थात दुनिया में गुरु को सर्वश्रेष्ठ समझना चाहिए क्योंकि गुरु के समान अन्य कोई नहीं है। गुरु कि आज्ञा का पालन सदैव पूर्ण भक्ति एवम् श्रद्धा से करने वाले जीव को संपूर्ण लोकों में किसी प्रकार का भय नहीं रहता। गुरु कि परमकृपा और ज्ञान बल से निर्भय जीवन व्यतीत करता है।

कबीर ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और।
हरि के रुठे ठौर है, गुरु रुठे नहिं ठौर।।

अर्थ :- कबीरदास जी कहते है कि वे मनुष्य अंधों के समान है जो गुरु के महत्व को नहीं समझते। भगवान के रुठने पर स्थान मिल सकता है किन्तु गुरु के रुठने पर कहीं स्थान नहीं मिलता।

गुरु मुरति गति चन्द्रमा, सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहें, गुरु मुरति की ओर।।

अर्थ :- कबीर साहब सांसारिक प्राणियो को गुरु महिमा बतलाते हुए कहते हैं कि हे मानव। गुरु कीपवित्र मूर्ति को चंद्रमा जानकर आठों पहर उसी प्रकार निहारते रहना चाहिये जिस प्रकार चकोर निहारता है तात्पर्य यह कि प्रतिपल गुरु का ध्यान करते रहें।

कबीर गुरु की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार।
धुंवा का सा धौरहरा, बिनसत लगे न बार।।

अर्थ :- संत कबीर जी कहते हैं कि गुरु की भक्ति के बिना संसार में इस जीवन को धिक्कार है क्योंकी इस धुएँ रुपी शरीर को एक दिन नष्ट हो जाना हैं फिर इस नश्वर शरीर के मोह को त्याग कर भक्ति मार्ग अपनाकर जीवन सार्थक करें।

भक्ति बिना नहिं निस्तरै, लाख करै जो काय।
शब्द सनेही है रहै, घर को पहुचे सोय।।

अर्थ :- भक्ति के बिना उद्धार होना संभव नहीं है चाहे कोई लाख प्रयत्न करे सब व्यर्थ है। जो जीव सद्गुरु के प्रेमी है, सत्यज्ञान का आचरण करने वाले है वे ही अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सके है।

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रोंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौदूंगी तोय।

अर्थ :- मिट्टी, कुम्हार से कहती है, कि आज तू मुझे पैरों तले रोंद (कुचल) रहा है। एक दिन ऐसा भी आएगा कि मैं तुझे पैरों तले रोंद दूँगी।

गुरु को मानुष जानते, ते नार कहिए अन्ध।
होय दुखी संसार मे, आगे जम की फन्द।।

अर्थ :- कबीरदास जी ने सांसारिक प्राणियो को ज्ञान का उपदेश देते हुए कहा है की जो मनुष्य गुरु को सामान्य प्राणी (मनुष्य) समझते हैं उनसे बडा मूर्ख जगत मे अन्य कोई नहीं है, वह आँखों के होते हुए भी अन्धे के समान है तथा जन्म-मरण के भव-बंधन से मुक्त नहीं हो पाता।

गुरु महिमा गावत सदा, मन राखो अतिमोद।
सो भव फिर आवै नहीं, बैठे प्रभू की गोद।।

अर्थ :- जो प्राणी गुरु की महिमा का सदैव बखान करता फिरता है और उनके आदेशों का प्रसन्नता पूर्वक पालन करता है उस प्राणी का पुनःइस भव बन्धन रुपी संसार मे आगमन नहीं होता। संसार के भव चक्र से मुक्त होकार बैकुन्ठ लोक को प्राप्त होता है।

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे , ये करि लेय महंत।।

अर्थ :- गुरु और पारस के अंतर को सभी ज्ञानी पुरुष जनते हैं। पारस मणी के विषय जग विख्यात है कि उसके स्पर्श से लोहा सोने का बाण जाता है किन्तु गुरु भी इतने महान हैं कि अपने गुण-ज्ञान मे ढालकर शिष्य को अपने जैसा ही महान बना लेते हैं।

मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग।।

अर्थ :- साधुओं के साथ नियमित संगत करने और रात दिन भगवान का नाम जाप करते हुए भी उसका रंग इसलिये नहीं चढ़ता क्योंकि आदमी अपने अंदर के विकारों से मुक्त नहीं हो पाता।

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय।
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय।।

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है।

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

 

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय।
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय।।

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर अपने मन में शीतलता हो तो इस संसार में कोई बैरी नहीं प्रतीत होता। अगर आदमी अपना अहंकार छोड़ दे तो उस पर हर कोई दया करने को तैयार हो जाता है।

कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय।
तब कुल काको लाजि, चारि पांव का होय॥

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने परिवार की मर्यादा के लिये आदमी ने अपने आपको बिगाड़ लिया वरना वह तो हंस था। उस कुल की मर्यादा का तब क्या होगा जब परमार्थ और सत्संग के बिना जब भविष्य में उसे पशु बनना पड़ेगा।

आगि जो लगी समुद्र में, धुआं न प्रगट होए।
की जाने जो जरि मुवा, जाकी लाई होय।।

अर्थ :- फिर इससे बचने का उपाय क्या है? मन को चिंता रहित कैसे किया जाए? कबीर कहते हैं, सुमिरन करो यानी ईश्वर के बारे में सोचो और अपने बारे में सोचना छोड़ दो। या खुद नहीं कर सकते तो उसे गुरु के जिम्मे छोड़ दो। तुम्हारे हित-अहित की चिंता गुरु कर लेंगे। तुम बस चिंता मुक्त हो कर ईश्वर का स्मरण करो। और जब तुम ऐसा करोगे, तो तुरत महसूस करोगे कि सारे कष्ट दूर हो गए हैं।

कबिरा यह मन लालची, समझै नहीं गंवार।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।
कबिरा मन ही गयंद है, आंकुष दे दे राखु ।
विष की बेली परिहरी, अमरित का फल चाखु ।।

अर्थ :- इस चंचल मन के स्वभाव की विवेचना करते हुए कबीर कहते हैं, यह मन लोभी और मूर्ख हैै। यह तो अपना ही हित-अहित नहीं समझ पाता। इसलिए इस मन को विचार रूपी अंकुश से वश में रखो, ताकि यह विष की बेल में लिपट जाने के बदले अमृत फल को खाना सीखे।

पर नारी का राचना, ज्यूं लहसून की खान।
कोने बैठे खाइये, परगट होय निदान।।

अर्थ :- संत कबीरदास जी कहते हैं कि पराई स्त्री के साथ प्रेम प्रसंग करना लहसून खाने के समान है। उसे चाहे कोने में बैठकर खाओ पर उसकी सुंगध दूर तक प्रकट होती है।

मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।।

अर्थ :- मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो, उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा।

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

अर्थ :- कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमे बस मेरा गुजरा चल जाये, मैं खुद भी अपना पेट पाल सकूँ और आने वाले मेहमानो को भी भोजन करा सकूँ।

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

अर्थ :- जो जितनी मेहनत करता है उसे उसका उतना फल अवश्य मिलता है। गोताखोर गहरे पानी में जाता है तो कुछ ले कर ही आता है, लेकिन जो डूबने के डर से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं वे कुछ नहीं कर पाते हैं।

शब्द न करैं मुलाहिजा, शब्द फिरै चहुं धार।
आपा पर जब चींहिया, तब गुरु सिष व्यवहार।।

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द किसी का मूंह नहीं ताकता। वह तो चारों ओर निर्विघ्न विचरण करता है। जब शब्द ज्ञान से अपने पराये का ज्ञान होता है तब गुरु शिष्य का संबंध स्वतः स्थापित हो जाता है।

गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय।
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय॥

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

अर्थ :- जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।।

अर्थ :- इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो!

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।।

अर्थ :- कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।

छिनहिं चढै छिन उतरै, सों तो प्रेम न होय।
अघट प्रेमपिंजर बसै, प्रेम कहावै सोय।।

अर्थ :- वह प्रेम जो क्षण भर में चढ़ जाता है और दुसरे क्षण उतर जाता है वह कदापि सच्चा प्रेम नहीं हो सकता क्योंकि सच्चे प्रेम का रंग तो इतना पक्का होता है कि एक बार चढ़ गया तो उतरता ही नहीं अर्थात प्रेम वह है जिसमें तन मन रम जाये।

कबीर सुमिरण सार है, और सकल जंजाल।
आदि अंत मधि सोधिया, दूजा देखा काल।।

अर्थ :- संत कबीर जी कहते है की प्रभु का ध्यान सुमिरन , भजन, कीर्तन और आत्म चिन्तन ही परम सत्य है, बाकी सब झूठा है। आदि अन्त और मध्य के विषय में विचार करके सब देख लिया है। सुमिरन के अतिरिक्त बाकी सब काल के चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं।

कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय।
तब कुल काको लाजि है, चारिपांव का होय।।

अर्थ :- कुल की मर्यादा के मोह में पड़कर जीव पतित हो गया अन्यथा यह तो हंस स्वरुप था, किन्तु उसे भूलकर अदोगति में पड़ गया। उस समय का तनिक ध्यान करो जब चार पैरों वाला पशु बनकर आना होगा। तब कुल की मान मर्यादा क्या होगी?अर्थात अभी समय है , शुभ कर्म करके अपनी मुक्ति क उपयोग करो।

सार शब्द जानै बिना, जिन पर लै में जाय।
काया माया थिर नहीं, शब्द लेहु अरथाय।।

अर्थ :- सार तत्व को जाने बिना यह जीव प्रलय रूपी मृत्यु चक्र में पड़कर अत्यधिक दुःख पाता है। मायारूपी धन संपत्ति और पंचत्तत्वों में मिल जायेगा और धन संपत्ति पर किसी अन्य का अधिकार हो जायेगा। अतः काया और माया का अर्थ जानकर उचित मार्ग अपनाये।

गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन सब निष्फल गया, पूछौ वेद पुरान।।

अर्थ :- गुरु बिना माला फेरना पूजा पाठ करना और दान देना सब व्यर्थ चला जाता है चाहे वेद पुराणों में देख लो अर्थात गुरुं से ज्ञान प्राप्त किये बिना कोई भी कार्य करना उचित नहीं है।

साधु दर्शन महाफल, कोटि यज्ञ फल लेह।
इक मन्दिर को का पड़ी, नगर शुद्ध करि लेह।।

अर्थ :- साधु संतों का दर्शन महान फलदायी होता है, इससे करोड़ो यज्ञों के करने से प्राप्त होने वाले पूण्य फलों के बराबर फल प्राप्त होता है। सन्तो का दर्शन, उनके दर्शन के प्रभाव से एक मन्दिर नहीं, बल्कि पूरा नगर पवित्र और शुद्ध हो जाता है। सन्तों के ज्ञान रूपी अमृत से अज्ञानता का अन्धकार नष्ट हो जाता है।

बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार।
दोऊ चुकि खाली पड़े , ताको वार न पार।।

अर्थ :- साधु को वैरागी और संसारी माया से विरक्त होना चाहिए और गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रही प्राणी को उदार चित्त होना चाहिए। यदि ये अपने अपने गुणों से चूक गये तो वे खाली रह जायेगे। उनका उद्धार नहीं होगा।

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

 

माला तिलक तो भेष है, राम भक्ति कुछ और।
कहैं कबीर जिन पहिरिया, पाँचो राखै ठौर।।

अर्थ :- माला पहनना और तिलक लगाना तो वेश धारण करना है, इसे वाह्य आडम्बर ही कहेंगे। राम भक्ति तो कुछ और ही है। राम नाम रूपी आन्तरिक माला धारण करता है, वह अपनी पाँचों इन्द्रियों को वश में करके राम माय हो जाता है।

यह तो घर है प्रेम का ऊँचा अधिक इकंत।
शीष काटी पग तर धरै, तब पैठे कोई सन्त।।

अर्थ :- यह प्रेम रूपी घर अधिक ऊँचा और एकांत में बना हुआ है। जो अपना सिर काटकर सद्गुरु के चरणों में अर्पित करने की सामर्थ्य रखता हो वही इसमें आकर बैठ सकता है अर्थात प्रेम के लिए उत्सर्ग की आवश्यकता होती है।

सबै रसायन हम पिया, प्रेम समान न कोय।
रंचन तन में संचरै, सब तन कंचन होय।।

अर्थ :- मैंने संसार के सभी रसायनों को पीकर देखा किन्तु प्रेम रसायन के समान कोइ नहीं मिला। प्रेम अमृत रसायन के अलौकिक स्वाद के सम्मुख सभी रसायनों का स्वाद फीका है। यह शरीर में थोड़ी मात्रा में भी प्रवेश कर जाये तो सम्पूर्ण शरीर शुद्ध सोने की तरह अद्भुत आभा से चमकने लगता है अर्थात शरीर शुद्ध हो जाता है।

करता था तो क्यौं रहा, अब करि क्यौं पछताय।
बोवै पेड़ बबूल का, आम कहां ते खाय।।

अर्थ :- जब तू बुरे कार्यो को करता था, संतों के समझाने पर भी नहीं समझा तो अब क्यों पछता रहा है। जब तूने काँटों वाले बबूल का पेड़ बोया तो बबूल ही उत्पन्न होंगें आम कहां से खायगा। अर्थात जो प्राणी जैसा करता है, कर्म के अनुसार ही उसे फल मिलता है।

दुनिया के धोखें मुआ, चला कुटुम्ब की कानि।
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा मसानि।।

अर्थ :- सम्पूर्ण संसार स्वार्थी है। स्वार्थ की धोखा धड़ी में ही जीव मरता रहा और संसारी माया के बंधनों में जकड़ा रहा। तुम्हारे कुल की लज्जा तब क्या रहेगी जब तुम्हारे शव को ले जाकर लोग शमशान में रख देंगे।

अहिरन की चोरी करै, करे सुई का दान।
उंचा चढी कर देखता, केतिक दूर विमान।।

अर्थ :- अज्ञानता में भटक रहे प्राणियों को सचेत करते हुए कबीरदास जी कहते है – ए अज्ञानियों। अहरन की चोरी करके सुई का दान करता है । इतना बड़ा अपराध करने के बाद भी तू ऊँचाई पर चढ़कर देखता है कि मेरे लिए स्वर्ग से आता हुआ विमान अभी कितना दूर है। यह अज्ञानता नहीं तो और क्या है?

जिभ्या जिन बस में करी, तिन बस कियो जहान।
नहिं तो औगुन उपजे, कहि सब संत सुजान।।

अर्थ :- जिन्होंने अपनी जिह्वा को वश में कर लिया , समझो सरे संसार को अपने वश में कर लिया क्योंकि जिसकी जिह्वा वश में नहीं है उसके अन्दर अनेकों अवगुण उत्पन्न होते है। ऐसा ज्ञानी जन और संतों का मत है।

काम काम सब कोय कहै, काम न चीन्है कोय।
जेती मन की कल्पना, काम कहावै सोय।।

अर्थ :- काम शब्द का मुख से उच्चारण करना बहुत ही आसान है परन्तु काम की वास्तविकता को लोग नहीं पहचानते। उसके गूढ़ अर्थ को समझने का प्रयास नहीं करते। मन में जितनी भी विषय रूपी कल्पना है वे सभी मिलकर काम ही कहलाती हैं।

कबीर औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं।
तीन लोक की संपदा कब आवै घर मांहि।।

अर्थ :- मनुष्य की यह उल्टी खोपड़ी कभी धन से तृप्त नहीं होती बल्कि जिसके पास जितना अधिक धन होता है उसकी प्यास उतनी ही बढती जाती है। लोभी व्यक्ति के मन में सदैव यही भावना होती है कि कब तीनों लोको की संपत्ति हमारे घर आयेगी।

साधु ऐसा चाहिए, जाका पूरा मंग।
विपत्ति पडै छाडै नहीं, चढै चौगुना रंग।।

अर्थ :- साधु ऐसा होना चाहिए जिसका मन पूर्ण रूप से संतुष्ट हो। उसके सामने कैसा भी विकट परिस्थिति क्यों न आये किन्तु वह तनिक भी विचलित न हो बल्कि उस पर सत्य संकल्प का रंग और चढ़े अर्थात संकल्प शक्ति घटने के बजाय बढे।

साधु आवत देखि कर, हंसी हमारी देह।
माथा का गहर उतरा, नैनन बढ़ा स्नेह।।

अर्थ :- साधु संतों को आता हुआ देखकर यदि हमारा मन प्रसन्नता से भार जाता है तो समझो हमारे सारे कुलक्षण दूर हो गये। साधु संतों की संगति बहुत बड़े भाग्यशाली को प्राप्त होती है।

कबीर हरिरस बरसिया, गिरि परवत सिखराय।
नीर निवानू ठाहरै, ना वह छापर डाय।।

अर्थ :- सन्त कबीर दस जी कहते है की चाहे वह परवत हो या ऊँचा नीचा धरातल अथवा समतल मैदान, बरसात हर स्थानों पर समान रूप से होती है किन्तु पानी हर स्थान पर नहीं ठहरता, गड्ढे या तालाबों में ही रुक सकता है उसी तरह सद्गुरु का ज्ञान प्रत्येक प्राणी के लिए होता है किन्तु सच्चे जिज्ञासु ही ग्रहण कर सकते है।

बेटा जाये क्या हुआ, कहा बजावै थाल।
आवन जावन होय रहा, ज्यों कीड़ी की नाल।।

अर्थ :- पुत्र के उत्पन्न होने पर लोग खुशियां मानते है ढोल बजवाते हैं । ऐसी ख़ुशी किस लिए। संसार में ऐसा आना जाना लगा ही रहता है जैसे चीटियों की कतार का आना जाना।

सहकामी दीपक दसा, सीखै तेल निवास।
कबीर हीरा सन्त जन, सहजै सदा प्रकाश।।

अर्थ :- विषय भोग में सदा लिप्त रहने वाले मनुष्यों की दशा जलते हुए उस दीपक के समान है जो अपने आधार रूप तेल को भी चूस लेता है जिससे वह जलता है। कबीर दास जी कहते है कि सन्त लोग उस हीरे के समान है जिनका प्रकाश कभी क्षीण नहीं होता। वे अपने ज्ञान के प्रकाश से जिज्ञासु के ह्रदय को प्रकाशित करते है।

गुरु को कीजै दण्डवत, कोटि कोटि परनाम।
कीट न जाने भृंग को, गुरु कर ले आप समान।।

अर्थ :- गुरु के चरणों में लेटकर दण्डवत और बार बार प्रणाम करो। गुरु की महिमा अपरम्पार है, जिस तरह कीड़ा भृंग को नहीं जानता किन्तु अपनी कुशलता से स्वयं को भृंग के समान बना लेता है उसी प्रकार गुरु भी अपने ज्ञान रूपी प्रकाश के प्रभाव से शिष्य को अपने सामान बना लेते है।

सतगुरु मिले तो सब मिले, न तो मिला न कोय।
मात पिता सूत बांधवा, ये तो घर घर होय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है की सद्गुरु मिले तो जानो सब कोई मिल गये , कुछ मिलने को शेष नहीं रहा। माता-पिता , भाई-बहन , बंधू बांधव तो घर घर में होते है। सांसरिक रिश्तों से सभी परिपूर्ण हैं। सद्गुरु की प्राप्ती सभी को नहीं होती।

जो जागत सो सपन में, ज्यौं घट भीतर सांस।
जो जन जाको भावता, सो जन ताके पास।।

अर्थ :- जिस प्रकार जो सांसे जाग्रत अवस्था में हैं वही सांसें सोते समय स्वप्न अवस्था में घट के अन्दर आता जाता है उसी प्राकर जो जिसका प्रेमी है, वह सदा उसी के पास रहता है। किसी भी अवस्था में दूर नहीं होता।

जीवत कोय समुझै नहिं, मुवा न कह संदेस।
तन मन से परिचय नहीं, ताको क्या उपदेश।।

अर्थ :- जीवित अवस्था में कोई ज्ञान का उपदेश और सत्य की बातें सुनता नहीं। मर जाने पर उन्हें कौन उपदेश देने जायेगा। जिसे अपने तन मन की सुधि ही नहीं है उसे उपदेश देने से क्या लाभ?

मांगन मरण समान है, तोहि दई में सीख।
कहै कबीर समुझाय के, मति मांगै कोई भीख।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है कि दुसरों हाथ फैलाना मृत्यु के समान है। यह शिक्षा ग्रहण के लो। जीवन मी कभी किसी से भिक्षा मत मांगो। भिक्षा मांगना बहुत अभ्रम कार्य है। प्राणी दुसरों कि निगाह में गिरता ही है स्वयं अपनी दृष्टि में पतित हो जाता है।

जिन गुरु जैसा जानिया, तिनको तैसा लाभ।
ओसे प्यास न भागसी, जब लगि धसै न आस।।

अर्थ :- जिसे जैसा गुरु मिला उसे वैसा ही ज्ञान रूपी लाभ प्राप्त हुआ। जैसे ओस के चाटने से सभी प्यास नहीं बुझ सकती उसी प्रकार पूर्ण सद्गुरु के बिना सत्य ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता।

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

 

कबीर संगी साधु का दल आया भरपूर।
इन्द्रिन को मन बांधिया, या तन कीया घूर।।

अर्थ :- कबीर दस जी कहते हैं कि साधुओं का दल जिसें सद्गुण, सत्य, दया, क्षमा, विनय और ज्ञान वैराग्य कहते हैं, जब ह्रदय में उत्पन्न हुआ तो उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में करके शरीर का त्याग कर दिया। अर्थात वे यह भूल गये कि मै शरीर धारी हूं।

गाली ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच।
हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।

अर्थ :- गाली एक ऐसी है जिसका उच्चारण करने से कलह और क्लेश ही बढ़ता है। लड़ने मरने पर लोग उतारू हो जाते है। अतः इससे बचकर रहने में ही भलाई है। इससे हारकर जो चलता है वही ज्ञानवान हैं किन्तु जो गाली से लगाव रखता है वह अज्ञानी झगडे में फंसकर अत्यधिक दुःख पाता है।

कर्म फंद जग फांदिया, जबतब पूजा ध्यान।
जाहि शब्द ते मुक्ति होय, सो न परा पहिचान।।

अर्थ :- कर्म के फंदे में फसे हुए संसार लोक भोग विलास एवम् कामनाओं के वशी भूत होकर जब तब पूजा पाठ करना भूल गये है किन्तु जिस सत्य स्वरूप ज्ञान से मोक्ष प्राप्त हो है उसे पहचान कि नही सके।

कहा भरोसा देह, बिनसी जाय छिन मांहि।
सांस सांस सुमिरन करो और जतन कछु नाहिं।।

अर्थ :- एस नश्वर शरीर का क्या भरोसा, क्षण मात्र में नष्ट हो सकता है अर्थात एक पल में क्या हो जाय, कोई भरोसा नहीं। यह विचार कर हर सांस मे सत्गुरू का सुमिरन करो। यही एकपात्र उपाय है।

बिना सीस का मिरग है, चहूं दिस चरने जाय।
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं, राखो तत्व लगाय।।

अर्थ :- मन रुपी मृग बिना सिर का है जो स्वच्छद रुपी से दूर दूर तक विचरण करता है। इस सद्गुरू के ज्ञान रुपी उपदेश की दोरी से बांधकर आत्म तत्व की साधन में लागाओ जो कि कल्याण का एक मात्र मार्ग है।

सांच कहूं तो मारि हैं, झुठै जग पतियाय।
यह जगकाली कूतरी, जो छेडै तो खाय।।

अर्थ :- संसार के प्राणियों के विषय में कबीर दास जी कहते हैं कि सत्य बोलने पर लोग मारने दौडते हैं और झुठ बोलने पर बडी आसानी से विश्वास कर लेते हैं। यह संसार काटने वाली काळी कुतिया के समान है जो इसे छेडता है उसे हि काट लेती है।

दीन गरीबी दीन को, दुंदुर को अभिमान।
दुंदुर तो विष से भरा, दीन गरीबी जान।।

अर्थ :- सरळ हृद्य मनुष्य को दीनता, सरलता एवम् सादगी अत्यन्त प्रिय लगती है किन्तु उपद्रवी व्यक्ति अभिमान रुपी विष से भरा रहता है और विनम्र प्राणी अपनी सादगी को अति उत्तम समझता है।

गुरु सों प्रीती निबाहिये, जेहि तत निबहै संत।
प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रेम निकट गुरु कंत।।

अर्थ :- जिस प्रकार भी सम्भव हो गुरु से प्रेम का निर्वाह करना चाहिए और निष्काम भाव से गुरु की सेवा करके उन्हें प्रसन्न रखना चाहिए। प्रेम बिना वे दूर ही हैं। यदि प्रेम है तो वे सदैव तुम्हारे निकट रहेगें।

सतगुरु सम कोई नहीं, सात दीप नौ खण्ड।
तीन लोक न पाइये, अरु इक इस ब्राहमण्ड।।

अर्थ :- सम्पूर्ण संसार में सद्गुरू के समान कोई अन्य नहीं है। सातों व्दीप और नौ खण्डों में ढूंढनें पर भी गुरु के समान कोई नहीं मिलेगा। गुरु हि सर्वश्रेष्ठ है । इसे सत्य जानो।

कबीर माया पापिनी, लोभ भुलाया लोग।
पुरी किनहूं न भोगिया, इसका यही यही बिजोग।।

अर्थ :- कबीर जो कहते हैं कि यह माया पापिनी है। इसने लोगों पर लोभ का परदा डालकर अपने वश में कर रखा है। इसे कोई भी पुरी तऱ्ह भोग नहीं पाया अर्थात जिसने जितना भी भोगा वह अधुरा ही रह गया और यही इसका वियोग है।

काम क्रोध मद लोभ की, जब लग घट में खान।
कबीर मूरख पंडिता, दोनो एक समान।।

अर्थ :- संत शिरोमणी काबीर जी मूर्ख और ज्ञानी के विषय में कहते हैं कि जब तक काम, क्रोध, मद एवम् लोभ आदि दुर्गुण मनुष्य के हृदय में भरा है तब तक मूर्ख और पंडित (ज्ञानी) दोनों एक समान है। उपरोक्त दुर्गुणों को अपने हृदय से निकालकर जो भक्ति ज्ञान का अवलम्बन करता है वही सच्चा ज्ञानी है।

झूठा सब संसार है, कोऊ न अपना मीत।
राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत।।

अर्थ :- यह छल कपट, मोह, विषय आदि सब झूठे हैं। यहाँ पर सभी स्वार्थीं है कोई अपना मित्र नहीं है। जिसने राम नाम रुपी अविनाशी परमात्मा को जान लिया वह भवसागर से पार होकर परमपद को प्राप्त होगा। यही परम सत्य है।

बिरछा कबहुं न फल भखै, नदी न अंचवै नीर।
परमारथ के कारने, साधू धरा शरीर।।

अर्थ :- वृक्ष अपने फल को स्वयं नही खाते, नदी अपना जल कभी नहीं पीती। ये सदैव दुसरो की सेवा करके प्रसन्न रहते हैं उसी प्रकार संतों का जीवन परमार्थ के लिए होता है अर्थात् दुसरो का कल्याण करने के लिए शरीर धारण किया है।

आंखों देखा घी भला, ना मुख मेला तेल।
साधु सों झगडा भला, ना साकट सों मेल।।

अर्थ :- आँखों से देखा हुआ घी दर्शन मात्र भी अच्छा होता है किन्तु तेल तो मुख में डाला हुआ भी अच्छा नहीं होता। ठीक इसी तऱह साधु जनों से झगडा कर लेना अच्छा है किन्तु बुद्धिहीन से मिलाप करना उचित नहीं है।

साधु बिरछ स्त ज्ञान फल, शीतल शब्द विचार।
जग में होते साधु नहीं, जर मरता संसार।।

अर्थ :- साधु जन सुख प्रदान करने वाले वृक्ष के समान है और उनके सत्यज्ञान को अमृतमयी फल समझकर ग्रहण करो। सधुओं के शीतल शब्द, मधुर विचार हैं। यदि इस संसार में साधु समझकर नहीं होते तो संसार अज्ञान की अग्नि में जल मरता।

आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह।
यह तीनों तबही गये, जबहिं कहा कछु देह।।

अर्थ :- अपनी आन चली गई, यान सम्मान भी गया और आँखों से प्रेम की भावना चली गयी। ये तीनों तब चले गये जब कहा कि कुछ दे दो अर्थात आप जब कभी किसी से कुछ माँगोगे। अर्थात् भिक्षा माँगना अपनी दृष्टी से स्वयं को गिराना है अतः भिक्षा माँगने जैसा त्याज्य कार्य कदापि न करो।

कबीर संगत साधु कि, नित प्रिती कीजै जाय।
दुरमति दूर बहावासी, देसी सुमति बताय।।

अर्थ :- संत कबीर दास जी कहते हैं कि सज्जन लोगों की संगत में प्रतिदिन जाना चाहिए। उनके सत्संग से र्दुबुद्धि दूर हो जाता है और सद्ज्ञान प्राप्त होता है।

सुरति फंसी संसार में , ताते परिगो चूर।
सुरति बांधि स्थिर करो, आठों पहर हजूर।।

अर्थ :- चंचल मन की वृत्ति संसार के विषय भोग रूपी मोह में फंसी हो तो सद्गुरु परमात्मा से दूरी हो जाती है। यदि संयम धारण करके मन को स्थिर कर आत्म स्वरुप में लगा दिया जाये तो वह आठों पहर उपस्थित रहेगा। मन को एकाग्र करके सद्गुरु के नाम का प्रतिक्षण सुमिरन करते रहना चाहिए। यही मोक्ष का उत्तम मार्ग है।

माला फेरै कह भयो, हिरदा गांठि न खोय।
गुरु चरनन चित रखिये, तो अमरापुर जोय।।

अर्थ :- माला फेरने से क्या होता है जब तक हृदय में बंधी गाठ को आप नहीं खोलेंगे। मन की गांठ खोलकर, हृदय को शुध्द करके पवित्र भाव से सदगुरू के श्री चरणों का ध्यान करो। सुमिरन करने से अमर पदवी प्राप्ति होगी।

चतुराई क्या कीजिए, जो नहिं शब्द समाय।
कोटिक गुन सूवा पढै, अन्त बिलाई जाय।।

अर्थ :- वह चतुराई हि किस अर्थ की जब सदगुरू के सदज्ञान के उपदेश ही हृदय में नहीं समाते। उस प्रवचन का क्या लाभ? जिस प्रकार करोड़ों की बात सीखता पढता है परन्तु अवसर मिलते ही बिल्ली उसी (तोते को) खा जाती है। ठीक उसी प्रकार सदगुरू हो ज्ञानंरुपी प्रवचन सुनकर भी अज्ञानी मनुष्य यूं ही तोते की भांति मर जाते हैं।

Kabir Ke Dohe [ Sant kabir Das Ke Dohe ] in Hindi.

 

साधु आवत देखि के, मन में कर मरोर।
सो तो होसी चुहरा, बसै गांव की ओर।।

अर्थ :- साधु को आता हुआ देखकर जिस व्यक्ति के मन मरोड उठती है अर्थात साधु जन का आगमन भार स्वरूप प्रतीत (महसूस) होता है, वह अगले जन्म में चुडे चान्दाल का जन्म पायेगा और गांव के किनारे जाकर रहेगा। सन्तों से उसकी भेंट नहीं होगी।

तन को जोगी सब करै, मन को करै ल कोय।
सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय।।

अर्थ :- ऊपरी आवरण धारण करके हर कोई योगी बन सकता है किन्तु मन की चंचलता को संयमित करके कोई योगी नहीं बनता। यदि मन को संयमित करके योगी बने तो सहजरूप में उसे समस्त सिद्धीयां प्राप्त हो जायेंगी।

मांग गये सो मर रहे, मरै जु मांगन जांहि।
तिनतैं पहले वे मरे, होत करत है नाहिं।।

अर्थ :- जो किसी के घर कुछ मांगने गया, समझो वह मर गया और जो मांगने जायेगा किन्तु उनसे पहले वह मर गया जो होते हुए भी कहता है कि मेरे पास नहीं है।

कबीर कुल सोई भला, जा कुल उपजै दास।
जा कुल दास न ऊपजै, सो कुल आक पलास।।

अर्थ :- कबीर दास जो कहते हैं की उस कुल में उत्पन्न होना अति उतम है जिस कुल में गुरु भक्त और शिष्य उत्पन्न हुए हों किन्तु जिस कुल में भक्त उत्पन्न नहीं होता उस कुल में जन्म लेना मदार और पलास के पेड के समान निरर्थक है।

शब्द जु ऐसा बोलिये, मन का आपा खोय।
ओरन को शीतल करे, आपन को सुख होय।।

अर्थ :- ऐसी वाणी बोलिए जिसमें अहंकार का नाम न हो और आपकी वाणी सुनकर दुसरे लोग भी पुलकित हो जाँ तथा अपने मन को भी शान्ति प्राप्त हो।

जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय।
सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय।।

अर्थ :- जंत्र मंत्र का आडम्बर सब झूठ है, इसके चक्कर में पडकर अपना जीवन व्यर्थ न गँवाये। गूढ ज्ञान के बिना कौवा कदापि हंस नहीं बन सकता। अर्थात दुर्गुण से परिपूर्ण आज्ञानी लोग कभी ज्ञानवान नहीं बन सकते।

साधु चलत से दीजिए, कीजै अति सनमान।
कहैं कबीर कछु भेट धरुं, अपने बित्त अनुमान।।

अर्थ :- साधु जन जब प्रस्थान करने लगे तो प्रेम विह्वल होकर आंखों से आंसू निकल आये। जिस तरह उनका सम्मान करो और सामर्थ्य के अनुसार धन आदि भेंट करो। साधु को अपने द्वार से खाली हाथ विदा नहीं करना चाहिए।

मास मास नहिं करि सकै , छठै मास अलबत्त।
यामें ढील न कीजिए, कहैं कबीर अविगत्त।।

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है कि हर महीने साधु संतों का दर्शन करना चाहिए। यदि महीने दर्शन करना सम्भव नहीं है तो छठें महीने अव्श्य दर्शन करें इसमें तनिक भी ढील मत करो।

साधु साधु सबही बड़े, अपनी अपनी ठौर।
शब्द विवेकी पारखी, ते माथे के मौर।।

अर्थ :- अपने अपने स्थान पर सभी साधु बड़े है। साधुजनों में कोई छोटा अथवा बड़ा नहीं है क्योंकि साधु शब्द ही महानता का प्रतीक है अर्थात सभी साधु सम्मान के अधिकारी है किन्तु जो आत्मदर्शी साधु है वे सिर के मुकुट हैं.

साधु सती और सूरमा, राखा रहै न ओट।
माथा बांधि पताक सों, नेजा घालै चोट।।

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी साधु, सती और शूरवीर के विषय बताते हैं कि ये तीनों परदे की ओट में नहीं रखे जा सकते। इनके मस्तक पर पुरुषार्थ की ध्वजा बंधी रहती है। कोई उन पर भाले से भी प्रहार करे फिर भी ये अपने मार्ग से विचलित नहीं होते.

माला तिलक लगाय के, भक्ति न आई हाथ।
दाढ़ी मूंछ मुंडाय के, चले चुनि का साथ।।

अर्थ :- माला पहन ली और मस्तक पर तिलक लगा लिया फिर भी भक्ति हाथ नहीं आई। दाढ़ी मुंडवा ली, मूंछ बनवा ली और दुनिया के साथ चल पड़े फिर भी कोई लाभ नहीं हुआ। तात्पर्य यह कि ऊपरी आडम्बर से भक्ति नहीं होती मात्र समाज को धोखा देना है और स्वयम अपने अप से छल करना है.

मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग।
तासों तो कौवा भला, तन मन एकहिं अंग।।

अर्थ :- जिस व्यक्ति का शरीर तो उजला है किन्तु मन मैला है अर्थात मन में पाप की गंदगी भरी हुई है वह बगुले के समान कपटी है उससे अच्छा तो कौवा ही है जिसका तन मन एक जैसा है। ऊपर से सज्जन दिखायी देने वाले और अन्दर से कपट स्वभाव रखने वाले व्यक्तियों से सदा सावधान रहना चाहिए.

[td_smart_list_end]

Last Word : दोस्तों आज हमने आपसे 250+ kabir ke dohe अर्थ सहित share किये है और हमें उम्मीद है आपको यह पढ़ के आनद हुआ होगा और हम यह आशा करते है की आप kabir ke dohe में बताये गए सूत्र को अपने जीवन में जरुर अनुसरण करेंगे और अपने जीवन को आनंददायी बनायेंगे. kabir ke dohe आपको कैसे लगे ? आपका कोई सवाल या सुझाव हो तो कृपया comment करके बताये और kabir ke dohe अपने मित्रो से शेयर जरुर करे. साथ ही साथ हमारे साथ facebook पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करके facebook page like करे.

10 Comments

    • Indihow
    • Indihow
    • Indihow
    • Indihow

Add Comment